जबलपुर। जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय अंतर्गत कृषि विज्ञान केंद्रों में पदस्थ वैज्ञानिकों और कर्मचारियों के हित में देश की शीर्ष अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को निर्देशित किया कि पूर्व में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के समक्ष दिए गए वचनों का अक्षरशः पालन किया जाए। इस मामले में कर्मियों का पक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता मनोज शर्मा और वरिष्ठ अधिवक्ता अर्पण पवार ने रखा। सर्वोच्च अदालत ने यह स्पष्ट व्यवस्था दी है कि अनुसंधान परिषद द्वारा वैज्ञानिकों एवं कर्मियों को नियमित वेतन के साथ मिलने वाले अन्य समस्त सेवा लाभ रोकने की कार्रवाई गलत है, अतः पूर्व निर्धारित अंडरटेकिंग के अनुसार समस्त देयकों का भुगतान सुनिश्चित करना अनिवार्य है।
वेतन भत्तों की कटौती से उपजा विवाद
विवाद की शुरुआत 5 वर्ष पूर्व हुई थी, जब भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने देश भर के कृषि विज्ञान केंद्रों में कार्यरत अमले को मिलने वाले मूल वेतन के अतिरिक्त महंगाई भत्ता, गृह भाड़ा भत्ता और पेंशन अंशदान की राशि रोक दी थी। अचानक लिए गए इस प्रशासनिक निर्णय के कारण कृषि तकनीकी विशेषज्ञों और सहायक कर्मचारियों के समक्ष गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। प्रभावित कर्मचारियों ने इस कटौती के खिलाफ उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया, जहां एकल पीठ ने परिषद के उस मनमाने आदेश पर तुरंत प्रभाव से रोक लगा दी थी। न्यायिक रोक के बाद भी जब संबंधित महकमे ने भत्तों का वितरण बहाल नहीं किया, तब कर्मचारियों को न्यायालय की अवमानना याचिका दायर करनी पड़ी थी।
हाई कोर्ट में दिए वचन का उल्लंघन
अवमानना कार्यवाही के दौरान अनुसंधान परिषद ने लिखित आश्वासन प्रस्तुत किया था कि सभी कर्मियों को वेतन के साथ समस्त भत्ते दिए जाएंगे। इस भरोसे के बाद कर्मियों ने अपनी याचिका वापस ले ली थी और देयकों का वितरण भी बहाल हुआ था। इसके बावजूद जनवरी 2026 में परिषद ने पुनः नियमों की अनदेखी करते हुए सभी सेवा लाभों पर पाबंदी लगा दी। इस एकतरफा कदम के विरुद्ध कर्मचारियों ने दोबारा हाई कोर्ट में अवमानना का वाद प्रस्तुत किया। इससे बचने के लिए संस्थान प्रबंधन विशेष अनुमति याचिका लेकर सीधे उच्चतम न्यायालय पहुंचा, किंतु खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि अपने ही विधिक वादों से मुकरना स्वीकार्य नहीं होगा।
