राज्य सलाहकार बोर्ड के समक्ष पक्ष रखने का अवसर दिए बिना निरुद्ध करने पर नोटिस जारी
जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एनडीपीएस एक्ट के तहत एक युवक को बिना पर्याप्त विधिक प्रक्रिया अपनाए सीधे 6 माह के लिए केंद्रीय जेल में निरुद्ध किए जाने के प्रशासनिक आदेश को गंभीरता से लिया है। मप्र हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने इस मामले में रीवा संभागायुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी कर विस्तृत जवाब तलब किया है। अदालत ने प्रशासन से पूछा है कि विधिक प्रावधानों के उल्लंघन पर यह आदेश क्यों न निरस्त किया जाए। यह पूरा मामला रीवा निवासी ओमप्रकाश गुप्ता की ओर से उच्च न्यायालय में दायर की गई एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका से जुड़ा हुआ है। याचिका में रीवा संभागायुक्त द्वारा जारी उस दंडात्मक आदेश को सीधे चुनौती दी गई है, जिसके तहत याचिकाकर्ता को मादक पदार्थों के अवैध कारोबार में लिप्त होने का आरोप लगाते हुए छह महीने की अवधि के लिए भोपाल सेंट्रल जेल में निरूद्ध रखने का फरमान सुनाया गया है।
सलाहकार बोर्ड के समक्ष नहीं दिया गया अवसर, नैसर्गिक न्याय के हनन का आरोप
हाईकोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता आलोक तिवारी ने दलील दी कि कार्यपालक दंडाधिकारी यानी रीवा संभागायुक्त ने 5 अक्टूबर 2026 को स्वापक औषधि और मन प्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम (एनडीपीएस एक्ट) के प्रावधानों के अंतर्गत यह विवादित आदेश पारित किया है। अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि कानून के स्थापित नियमों के मुताबिक किसी भी व्यक्ति को ऐसे विशेष अधिनियम के तहत बंदी बनाए जाने से पहले या उसके तुरंत बाद मामले को राज्य सलाहकार बोर्ड के समक्ष समीक्षा के लिए भेजा जाना अनिवार्य होता है। अधिवक्ता ने तर्क दिया कि संबंधित व्यक्ति को राज्य सलाहकार बोर्ड के समक्ष व्यक्तिगत रूप से अथवा अपने विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से पक्ष रखने का वैधानिक अवसर प्रदान किया जाना नैसर्गिक न्याय का बुनियादी सिद्धांत है। इस मामले में संभागायुक्त कार्यालय द्वारा याचिकाकर्ता को ऐसा कोई भी अवसर दिए बिना मनमाने तरीके से सीधे आदेश जारी कर उसे रीवा से भोपाल जेल भेज दिया गया, जो कि उसके मौलिक और संवैधानिक अधिकारों का सीधा हनन है।डिवीजन बेंच ने याचिका में उठाए गए विधिक बिंदुओं, तथ्यों और प्रस्तुत तर्कों पर प्रारंभिक सुनवाई करने के उपरांत इसे अत्यंत विचारणीय माना। युगलपीठ ने रीवा संभागायुक्त को औपचारिक नोटिस जारी करते हुए निर्धारित समय-सीमा के भीतर संपूर्ण मूल रिकॉर्ड के साथ शपथ पत्र पर जवाब प्रस्तुत करने के कड़े निर्देश दिए हैं। मामले की आगामी सुनवाई जवाब आने के बाद नियत की जाएगी।
