कलेक्टर की समीक्षा बैठक में भड़के राजस्व अफसर, शनिवार-रविवार को बैठक का तीखा विरोध
जबलपुर। जिला कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में राजस्व अधिकारियों की समीक्षा बैठक के दौरान आज उस समय अप्रत्याशित स्थिति बन गई, जब जिले भर से आए तहसीलदारों और नायब तहसीलदारों ने अवकाश के दिन बुलाई जाने वाली बैठकों का सीधा विरोध शुरू कर दिया। इन मैदानी अफसरों ने जिला कलेक्टर राघवेंद्र सिंह को एक 3 सूत्रीय औपचारिक ज्ञापन सौंपते हुए साफ कर दिया कि वे भविष्य में शनिवार-रविवार या किसी भी राजपत्रित छुट्टी के दिन मुख्यालय में आयोजित होने वाली बैठकों में शामिल नहीं होंगे। बैठक कक्ष के भीतर अपनी मांगों को पुरजोर तरीके से रखते हुए अफसरों ने स्पष्ट किया कि सप्ताह के सातों दिन लगातार काम करने से उनके निजी जीवन पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है। इस पूरी घटना से कलेक्ट्रेट परिसर में हड़कंप मच गया और जिले की प्रशासनिक व्यवस्था में इस अप्रत्याशित कदम की तेज चर्चा शुरू हो गई।
सरकारी अवकाश पर काम से मानसिक दबाव बढ़ा
तहसीलदारों का स्पष्ट मत है कि राजस्व विभाग में नामांतरण, बंटवारा, सीमांकन, अतिक्रमण हटाने, कानून व्यवस्था बनाए रखने और वीआईपी दौरों के चलते उन पर पहले से ही अतिरिक्त कार्यभार रहता है। लगातार 7 दिन बिना किसी विश्राम के फील्ड और दफ्तर में दौड़-भाग करने के कारण फील्ड स्तर के अधिकारियों का स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा है। परिवार को समय न दे पाने से पारिवारिक कलह और गंभीर मानसिक तनाव की स्थिति बन रही है। अफसरों ने ज्ञापन के जरिए अवगत कराया कि शासन के स्पष्ट नियम हैं कि शासकीय अवकाश पर अत्यंत आवश्यक या आपातकालीन परिस्थितियों को छोड़कर सामान्य समीक्षा बैठकें आयोजित नहीं की जानी चाहिए। नियमित कामकाज के लिए तय कार्यदिवसों का उपयोग होना चाहिए, ताकि कार्यक्षमता बनी रहे।
अन्य विभागों के कर्मचारी भी चाहते हैं राहत
कलेक्ट्रेट में तहसीलदारों द्वारा उठाए गए इस कदम के बाद जिले के अन्य प्रमुख विभागों में भी अंदरूनी सुगबुगाहट तेज हो गई है। जिला पंचायत, लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी, महिला एवं बाल विकास और शिक्षा विभाग के मैदानी कर्मचारी भी लंबे समय से शनिवार- रविवार को होने वाली वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग और बैठकों से त्रस्त हैं। अब तक उच्चाधिकारियों की नाराजगी और अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से कोई खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। राजस्व अधिकारियों के इस खुले रुख ने बाकी संवर्गों को भी अपनी बात रखने की हिम्मत दी है। कर्मचारी संगठनों का मानना है कि शासकीय कैलेंडर में घोषित अवकाश दिवस कर्मचारियों के अधिकार क्षेत्र में आता है, जिसे बैठकों के नाम पर समाप्त नहीं किया जाना चाहिए।
कलेक्ट्रेट के अगले रुख पर टिकी नजरें
इस घटनाक्रम के बाद अब जिला प्रशासन के शीर्ष स्तर पर असमंजस की स्थिति बन गई है। शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं की प्रगति, राजस्व वसूली के लक्ष्य और समय-सीमा पत्रों के त्वरित निपटारे के लिए साप्ताहिक बैठकें अनिवार्य मानी जाती हैं। यदि बैठकों का यह बहिष्कार आगे भी जारी रहता है तो लंबित प्रकरणों की निगरानी व्यवस्था प्रभावित हो सकती है। कलेक्ट्रेट प्रबंधन अब इस बात पर मंथन कर रहा है कि क्या केवल सोमवार से शुक्रवार के नियमित कार्यदिवसों में ही बैठकें सीमित की जाएं या फिर वरिष्ठ अधिकारियों से मार्गदर्शन लेकर कोई बीच का रास्ता निकाला जाए। राजस्व अफसरों के इस कड़े फैसले पर अंतिम प्रशासनिक निर्णय का इंतजार सभी को है।
