नानाजी देशमुख विश्वविद्यालय के डॉक्टरों का कमाल, गंभीर बीमार बाघिन को दी नई जिंदगी
जबलपुर। वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व की मोहली रेंज से गंभीर हालत में बचाई गई मादा बाघ को नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ वाइल्ड लाइफ फॉरेंसिक एंड हेल्थ में 3 महीने के गहन इलाज के बाद विशेष सुरक्षित वाहन से वन विहार राष्ट्रीय उद्यान भेज दिया गया। 9 जुलाई को जब इसे केंद्र लाया गया था, तब जांच में खतरनाक कैनाइन डिस्टेंपर संक्रमण की पुष्टि हुई थी। कुलपति डॉ. मनदीप शर्मा, स्कूल संचालक डॉ. राजेश कुमार शर्मा, डॉ. अमूल रोकड़े, डॉ. काजल जाधव और भोपाल से आए आरएफओ नीलेश की टीम ने लगातार इलाज व उचित प्रबंधन कर वन्यप्राणी की जान बचाई। प्रधान मुख्य वन संरक्षक वन्य प्राणी भोपाल के निर्देशानुसार यह स्थानांतरण संपन्न हुआ।
डॉक्टरों ने कैनाइन डिस्टेंपर का किया सफल इलाज
गंभीर अवस्था में रेस्क्यू केंद्र लाई गई बाघिन का परीक्षण करने पर चिकित्सकों को उसमें जानलेवा कैनाइन डिस्टेंपर के लक्षण मिले थे। इसके तुरंत बाद संस्थान के विशेषज्ञों की टीम ने उसे विशेष पिंजरे में रखकर सघन निगरानी शुरू की। डॉ. अमूल रोकड़े के नेतृत्व में मेडिकल टीम ने पल-पल की शारीरिक जांच करते हुए निरंतर दवाइयां दीं। पशु चिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय जबलपुर के मेडिसिन विभाग की फैकल्टी ने भी जरूरी चिकित्सीय मदद उपलब्ध कराई। संक्रमण से कमजोर हुए वन्यजीव की रिकवरी के लिए विशेष खानपान और अनुकूल वातावरण तैयार किया गया।
स्वास्थ्य सुधार के बाद बनी नई रणनीति
उपचार के दौरान कई बार स्वास्थ्य में उतार-चढ़ाव आए, जिससे चिकित्सा दल को अपनी योजना बार-बार बदलनी पड़ी। कुलपति ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि चिकित्सा प्रक्रिया और देखरेख में तनिक भी लापरवाही न बरती जाए। पूरे 1 माह तक वन्यजीव प्रबंधन और वन विभाग के वरिष्ठ अफसरों के बीच पत्राचार चला कि पूर्ण स्वस्थ होने पर वन्यप्राणी को कहां रखा जाए। निरंतर देखरेख से जब शारीरिक मापदंड पूरी तरह स्थिर पाए गए, तब अधिकारियों ने भोपाल शिफ्ट करने की हरी झंडी दी।
