जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने कार्तिक सत्यनारायण विरुद्ध मध्य प्रदेश शासन मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने शासन का आवेदन स्वीकार कर याचिकाकर्ता को 2 सितंबर को दी गई अंतरिम सुरक्षा वापस ले ली। मप्र सरकार के विशेष अभियोजक ऋत्विक पाराशर ने पक्ष रखते हुए जांच में असहयोग और तीसरे समन को छिपाने का तथ्य सामने रखा। वन्यजीव अपराधों की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने वाइल्डलाइफ एसओएस के प्रमुख पदाधिकारी कार्तिक सत्यनारायण को 21 सितम्बर को सक्षम अधिकारी के समक्ष उपस्थित होकर जांच में सहयोग देने का आदेश दिया है। इस मामले में मध्य प्रदेश स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स शिकार और साजिश की कड़ियों की व्यापक जांच कर रही है।
अवैध शिकार तंत्र में सहयोग की होगी पड़ताल
स्टेट टाइगर स्ट्राइक फोर्स की जांच केवल उत्तर प्रदेश सीमा में तेंदुए की खाल बरामद होने तक सीमित नहीं है। जांच एजेंसी मध्य प्रदेश के वनों में संरक्षित वन्यजीवों के अवैध शिकार, उसमें उकसाने, सुविधाएं जुटाने, साजो-सामान का प्रबंध करने और परोक्ष मदद देने वाले नेटवर्क की पड़ताल कर रही है। शासन ने अदालत में स्पष्ट तर्क दिया कि किसी भी संगठन का पुराना रिकॉर्ड, वन विभागों से जुड़ाव अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा किसी व्यक्ति को कानूनी जांच से छूट नहीं दिला सकती। बचाव और पुनर्वास के क्षेत्र में काम करने का दावा करने वाली संस्था से जुड़े लोगों की वास्तविक भूमिका भी साक्ष्यों के आधार पर परखी जाएगी, ताकि वन्यजीव अपराध के पूरे गठजोड़ का खुलासा हो सके।
चीता परिदृश्य क्षेत्र में अवैध शिकार गंभीर संकट
यह मामला इसलिए भी बेहद नाजुक बन गया है क्योंकि घटना स्थल कूनो चीता परिदृश्य से सीधा जुड़ा हुआ है। ऐसे संवेदनशील पारिस्थितिक गलियारे में किसी शिकारी या संरक्षित वन्यजीव की हानि केवल एक जानवर के मरने तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा असर वन क्षेत्र की संपूर्ण खाद्य श्रृंखला, जैव विविधता और राष्ट्रीय चीता पुनर्स्थापना प्रोजेक्ट की सुरक्षा पर पड़ता है। संगठित शिकारियों की किसी भी संदिग्ध गतिविधि की बारीकी से तहकीकात करना अत्यंत जरूरी माना गया है, ताकि दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक रहवास सुरक्षित रह सके।
