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नए तेवर में भौतिक शास्त्र, दूर होगा विद्यार्थियों का पुराना डर



जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के भौतिक शास्त्र एवं इलेक्ट्रॉनिक स्नातकोत्तर अध्ययन एवं अनुसंधान विभाग द्वारा भारतीय ज्ञान परम्परा और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के संदर्भ में भौतिक शास्त्र स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम निर्माण विषय पर आयोजित 2 दिवसीय कार्यशाला का गुरुवार को आईक्यूएसी सभागार में समापन हुआ। समापन समारोह की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु प्रो. राजेश कुमार वर्मा ने विद्यार्थियों को भौतिक शास्त्र के डर से बाहर निकालने तथा इसे भारतीय परंपरा, दैनिक जीवन और प्रकृति से जोड़ने की बात कही। इस अवसर पर नोडल अधिकारी प्रो. राकेश बाजपेयी, सत्र अध्यक्ष प्रो. प्रज्ञेश अग्रवाल, प्रो. रामप्रसाद प्रजापति, मंच संचालक डॉ. पल्लवी शुक्ला और आभार व्यक्त करने वाले डॉ. रिंकेश भट्ट सहित उच्च शिक्षा विभाग एवं विश्वविद्यालय अध्ययन मंडल के अनेक विषय विशेषज्ञ उपस्थित रहे।

पाठ्यक्रम में जुड़ा भारत का प्राचीन वैज्ञानिक चिंतन

​कार्यशाला के अंतिम दिन तकनीकी सत्रों में एमएससी भौतिकी के आगामी सत्रों के शैक्षणिक ढांचे पर व्यापक मंथन हुआ। उच्च शिक्षा संस्थान भोपाल के प्रो. प्रज्ञेश अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोजित तीसरे सत्र में स्नातकोत्तर तृतीय सेमेस्टर के सिलेबस में भारतीय परंपरा तथा नैतिक मूल्यों से जुड़े वैज्ञानिक विषयों को शामिल किया गया। इसके बाद जेएनयू नई दिल्ली के प्रो. रामप्रसाद प्रजापति की अध्यक्षता वाले चौथे सत्र में चतुर्थ सेमेस्टर के ड्राफ्ट को अंतिम रूप देकर इसे वैकल्पिक कोर्स के रूप में लागू करने की सिफारिश की गई। विभागीय प्रमुख प्रो. बाजपेयी ने बताया कि इस पूरी कवायद का मूल उद्देश्य पाठ्यक्रम में पारंपरिक ज्ञान के तार्किक पक्षों को समाहित करना है। इससे युवाओं की विषयगत झिझक खत्म होगी और वे किताबी रटंत प्रणाली के स्थान पर प्रायोगिक समझ की ओर बढ़ेंगे।

वरिष्ठ शिक्षाविदों ने मिलकर तैयार किया नया प्रारूप

​शैक्षणिक सत्र के नए स्वरूप को तैयार करने में प्रदेश भर के प्रमुख शिक्षाविदों की सहभागिता रही। केंद्रीय अध्ययन मंडल उच्च शिक्षा विभाग की ओर से प्रो. स्वाति दुबे, प्रो. प्रवीण कुमार शर्मा, प्रो. अनुज हुंडेट, प्रो. अमित जैन, प्रो. प्रेरणा शर्मा और डॉ. श्वेता जैन ने अपने सुझाव रखे। वहीं रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय अध्ययन मंडल के सदस्य प्रो. पीके खरे, गिरीश वर्मा, प्रो. एमएल चौहान और प्रो. रवि कटारे ने स्थानीय शैक्षणिक जरूरतों के अनुसार बदलाव सुझाए। विषय विशेषज्ञ के तौर पर प्रो. प्रशांत सेलट, प्रो. कल्लोल दास, डॉ. अरूणेन्द्र कुमार पटेल, डॉ. आरके दुबे, डॉ. भावना सिंह एवं डॉ. डीके पाण्डेय ने भी विचार रखे। सभी विशेषज्ञों ने एकमत होकर माना कि आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धांतों के साथ प्राचीन भारतीय दृष्टि का तालमेल विद्यार्थियों की मौलिक सोच को समृद्ध करेगा।

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