जबलपुर। जबलपुर जिले के करीब 34 करोड़ रुपए के चर्चित धान परिवहन घोटाले की गूंज अब पूरे मध्य प्रदेश में सुनाई देगी। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की युगलपीठ ने इस गंभीर मामले की सुनवाई करते हुए प्रदेश के सभी जिला कलेक्टरों को व्यापक जांच कर रिपोर्ट देने के निर्देश जारी किए हैं। नागरिक उपभोक्ता मंच की ओर से दायर जनहित याचिका पर याचिकाकर्ता पीजी नाजपांडे और रजत भार्गव के वकील दिनेश उपाध्याय ने अदालत के समक्ष विस्तृत तथ्य रखे। अदालत ने आर्थिक अपराध ब्यूरो यानी ईओडब्ल्यू से अब तक हुई जांच की स्टेटस रिपोर्ट मांगी है और मध्य प्रदेश सिविल सप्लाई कॉरपोरेशन को शपथ पत्र के साथ स्थिति स्पष्ट करने का सख्त आदेश दिया है।
स्कूटर और बसों से दिखाया गया फर्जी परिवहन
अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों से खुलासा हुआ कि जबलपुर में धान उपार्जन और परिवहन के नाम पर बड़े पैमाने पर खेल किया गया। सरकारी रिकॉर्ड में 100 से 200 क्विंटल तक धान का उठाव दोपहिया और तिपहिया वाहनों से दिखाया गया था। जांच के दौरान कई ऐसे स्कूटर, ऑटो और यात्री बसों के पंजीयन नंबर दर्ज मिले, जिनसे भारी मात्रा में अनाज ढोना तकनीकी रूप से संभव ही नहीं है। इस फर्जीवाड़े की पुष्टि के बाद जबलपुर जिले में अलग-अलग व्यक्तियों और ट्रांसपोर्टरों के खिलाफ 90 से ज्यादा एफआईआर दर्ज कराई गईं। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि यह संगठित भ्रष्टाचार केवल जबलपुर तक सीमित नहीं है, बल्कि मंडला, बालाघाट, सिवनी और डिंडौरी जैसे पड़ोसी जिलों में भी ऐसे ही मामले उजागर हुए हैं।
सभी जिलों में कलेक्टर करेंगे घोटाले की जांच
हाईकोर्ट ने सुनवाई में स्पष्ट कहा कि यदि तत्कालीन जबलपुर कलेक्टर दीपक सक्सेना तत्परता और सक्रियता नहीं दिखाते तो करोड़ों का यह गबन कभी उजागर नहीं हो पाता। पीठ ने टिप्पणी की कि इसी प्रकार की सजगता अन्य जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों को भी दिखानी चाहिए थी। पूर्व में शासन द्वारा प्रदेश के 27 जिलों के कलेक्टरों को पड़ताल के निर्देश दिए गए थे, लेकिन जमीनी स्तर पर ठोस परिणाम नहीं आए। कोर्ट ने नागरिक आपूर्ति निगम से पूछा है कि जबलपुर की कार्रवाई के बाद उसने राज्य स्तर पर क्या कदम उठाए। ईओडब्ल्यू और सभी कलेक्टरों की रिपोर्ट आने के बाद यह साफ होगा कि मध्य प्रदेश में फर्जी धान परिवहन का यह जाल कितना गहरा फैला हुआ है।
