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एमपी हाईकोर्ट ने कहा मात्र संदेह के आधार पर दोषसिद्ध नहीं होता है, आजीवन कारावास की सजा की निरस्त

 जबलपुर। सिंगरौली के बहुचर्चित हत्याकांड में शामिल तीन आरोपियों को हाईकोर्ट ने बरी कर दिया है। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल व न्यायमूर्ति अवनिन्द्र कुमार सिंह की युगलपीठ ने साफ किया कि हत्या जैसे गंभीर अपराध में भी दोषसिद्धि तभी टिक सकती है, जब परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला संदेह से परे स्थापित हो। 

                              कोर्ट ने भैयालाल रावत एवं अन्य द्वारा दायर आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए 14 जून 2025 को तृतीय अपर सत्र न्यायाधीश, देवसर (जिला सिंगरौली) द्वारा सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा निरस्त कर दी। अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता बीके वैश्य व राज्य की ओर से शासकीय अधिवक्ता अजय ताम्रकार ने पक्ष रखा। यह मामला गोरेलाल विश्वकर्मा की हत्या से संबंधित था, जिसमें ट्रायल कोर्ट ने आरोपितों को धारा 302/34 एवं 201 आईपीसी के तहत दोषी ठहराया था। हाई कोर्ट ने रिकार्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि अभियोजन परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूर्ण एवं अखंड श्रृंखला स्थापित नहीं कर सका। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का लास्ट सीन साक्ष्य विरोधाभासों से ग्रस्त था। प्रमुख गवाह के बयान और केस डायरी में समय संबंधी गंभीर असंगतियां थीं। वहीं मृतक के गले में मिले गमछे की पहचान भी विश्वसनीय नहीं मानी गई, क्योंकि पहचानकर्ता ने स्वीकार किया कि पुलिस पहले ही उसे गमछा दिखा चुकी थी। हाई कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि प्रारंभिक एफआईआर अज्ञात आरोपितों के विरुद्ध दर्ज हुई थी और शुरुआती बयानों में अपीलकर्ताओं पर संदेह तक व्यक्त नहीं किया गया था। दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश भी रिकार्ड पर थी। इन परिस्थितियों में कोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के शरद बिर्धिचंद सरडा बनाम महाराष्ट्र राज्य के निर्णय का हवाला देते हुए कहा कि मात्र संदेह के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। परिणामस्वरूप अपील स्वीकार करते हुए दोषसिद्धि निरस्त कर आरोपितों की तत्काल रिहाई के आदेश दिए गए।


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