फर्जी परमिट और अवैध परिवहन का गंभीर मामला
इस पूरे विवाद की जड़ 26 फरवरी 2024 को जारी किया गया वह कारण बताओ नोटिस है, जिसमें कंपनियों पर फर्जी परमिट के माध्यम से शराब के अवैध परिवहन के गंभीर आरोप लगाए गए थे। जांच के उपरांत आबकारी विभाग ने 4 फरवरी 2026 को एक बड़ा कदम उठाते हुए कंपनियों के कुल 8 लाइसेंस निलंबित कर दिए थे। विभाग का तर्क था कि कंपनियों ने सरकारी राजस्व को क्षति पहुँचाने और धोखाधड़ी के जरिए व्यापारिक लाभ लेने का प्रयास किया है। इसी आदेश को कंपनियों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे अब न्यायालय ने बरकरार रखा है।
याचिकाओं में दी गई दलीलों को कोर्ट ने नकारा
कंपनियों की ओर से न्यायालय में यह तर्क दिया गया था कि जिस शो-कॉज नोटिस के आधार पर कार्रवाई की गई, वह 2023-24 की अवधि का था। चूंकि वह वित्तीय वर्ष 31 मार्च 2024 को समाप्त हो चुका था, इसलिए उस नोटिस के आधार पर वर्तमान सत्र के लाइसेंसों पर कार्रवाई करना कानूनन गलत है। याचिकाकर्ताओं ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का हवाला देते हुए एक साथ 8 लाइसेंस बंद करने को अनुचित बताया था। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता हरप्रीत सिंह रूपराह और शासकीय अधिवक्ता मानस मणि वर्मा ने इन दलीलों का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कोर्ट को बताया कि धोखाधड़ी के मामलों में पुरानी अवधि के उल्लंघन नई लाइसेंस अवधि को निश्चित रूप से प्रभावित करते हैं।
आबकारी के निर्णय पर न्यायालय की मुहर
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शो-कॉज नोटिस किसी निश्चित समयावधि तक सीमित नहीं रहता है। यदि किसी लाइसेंसधारी ने पूर्व में धोखाधड़ी की है, तो वह नए लाइसेंस के लिए पात्रता को प्रभावित करती है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शराब का कारोबार पूरी तरह से सरकार के नियंत्रण में होता है और नियमों के पालन की जिम्मेदारी कंपनी की होती है। प्रोपोर्शनैलिटी टेस्ट का हवाला देते हुए न्यायालय ने कहा कि डिस्टिलिंग और बॉटलिंग जैसे गंभीर कार्यों में गड़बड़ी पाए जाने पर व्यापक कार्रवाई करना मनमाना कदम नहीं है। मंगलवार को सुनाए गए इस फैसले के बाद आबकारी विभाग की कार्रवाई पर कानूनी मुहर लग गई है।
