जबलपुर। जबलपुर में बन रही देश की दूसरी सबसे लंबी रिंग रोड के निर्माण पर पश्चिम एशिया में जारी युद्ध का गहरा असर पड़ा है। लगभग 4000 करोड़ रुपये की लागत वाली इस महात्वाकांक्षी परियोजना की रफ्तार अब काफी सुस्त हो गई है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की भारी किल्लत के चलते निर्माण सामग्री के दामों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है जिससे कार्य की समयसीमा आगे खिसकती नजर आ रही है।
संसाधनों की कमी से बढ़ेगी लागत
पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों ने स्थानीय स्तर पर निर्माण कार्यों की गणित बिगाड़ दी है। बाजार में व्यवसायिक सिलिंडर की आपूर्ति बाधित होने से रिंग रोड पर होने वाले मार्किंग के कार्य पूरी तरह अटक गए हैं। इसके अतिरिक्त डामर की कीमतों में 50 प्रतिशत तक का भारी उछाल आया है और कमर्शियल डीजल के दाम भी 22 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ गए हैं। ईंधन और कच्चे माल की इस महंगाई के कारण निर्माण एजेंसियों ने काम में रुचि लेना कम कर दिया है। स्थिति इतनी गंभीर है कि साइटों पर काम करने वाले सैकड़ों मजदूरों के सामने भोजन का संकट भी उत्पन्न होने लगा है।
पांच पैकेज में बंटी है 114 किमी लंबी ये रोड
जबलपुर की यह रिंग रोड कुल 114 किमी लंबी है जिसे पांच अलग-अलग पैकेज में बांटकर तैयार किया जा रहा है। परियोजना का पहला पैकेज मार्च में ही पूरा होना प्रस्तावित था लेकिन वर्तमान परिस्थितियों ने इसकी गति को थाम दिया है। दूसरे पैकेज की बात करें तो यहां 70 प्रतिशत काम संपन्न हो चुका है। इस हिस्से में ब्रिज निर्माण को छोड़कर शेष कार्य के लिए जून 2026 तक का लक्ष्य रखा गया है। तेल की कीमतों में अस्थिरता और सप्लाई चेन टूटने से ठेकेदारों के लिए पुराने बजट में काम जारी रखना चुनौतीपूर्ण हो गया है।
समय-सीमा में बदलाव की नौबत से परेशानी
परियोजना के पैकेज तीन और चार के कार्यों को मई 2026 तक पूरा करने की योजना थी। हालांकि संसाधनों के अभाव और लागत बढ़ने के कारण अब इन पैकेजों की डेडलाइन भी आगे बढ़ गई है। पूरी परियोजना का लक्ष्य वर्ष 2026 निर्धारित है परंतु अंतरराष्ट्रीय तनाव और कच्चे तेल की किल्लत ने भविष्य की प्रगति पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। निर्माण स्थल पर मशीनरी के संचालन से लेकर सामग्री की ढुलाई तक सब कुछ महंगा होने से पूरी चार हजार करोड़ की योजना का बजट और समय दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
