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मध्यप्रदेश की सड़कों पर रोजाना 41 मौतें चिंताजनक, लापरवाही रोकने के लिए हाईकोर्ट ने मांगा जवाब


लोक निर्माण विभाग और ठेकेदारों की जवाबदेही तय करने के लिए हाईकोर्ट में न्याय मित्र नियुक्त

जबलपुर। मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की मुख्य पीठ जबलपुर ने प्रदेश में लगातार बढ़ती सड़क दुर्घटनाओं और प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही से जुड़े एक अत्यंत गंभीर मामले पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। समाजसेवी आशीष शिवहरे द्वारा दायर जनहित याचिका पर पहली सुनवाई के दौरान अदालत ने सड़क सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। न्यायालय ने इस याचिका की गंभीरता को देखते हुए प्रकरण में न्याय मित्र की नियुक्ति कर दी है।

​न्यायालय की कार्यवाही और न्याय मित्र का चयन

​इस जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय न्यायालय ने सड़क सुरक्षा और सिस्टम की विफलताओं की वैज्ञानिक जांच और कानूनी पहलुओं को समझने के लिए वरिष्ठ अधिवक्ता अरिहंत तिवारी को न्याय मित्र के रूप में नियुक्त किया है। इसके साथ ही इस मामले में प्रतिवादी नंबर 9 को नोटिस जारी कर उनका पक्ष रखने के निर्देश दिए गए हैं। अदालत का अपनी ओर से न्याय मित्र नियुक्त करना यह दर्शाता है कि न्यायाधीशों ने मामले में उठाए गए बिंदुओं को जनहित में महत्वपूर्ण माना है। अब इस प्रकरण की अगली सुनवाई 27 अप्रैल 2026 को निर्धारित की गई है, जिसमें न्याय मित्र और प्रतिवादी अपना पक्ष प्रस्तुत करेंगे।

​प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं के भयावह आंकड़े

​सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता आशीष शिवहरे ने सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय की नवीनतम रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यायालय को बताया कि मध्य प्रदेश की सड़कों पर हर दिन औसतन 41 लोगों की अकाल मृत्यु हो रही है। याचिका में यह तर्क दिया गया है कि प्रशासन अधिकांश सड़क हादसों को केवल चालक की गलती मानकर बंद कर देता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। प्रदेश में खराब सड़क इंजीनियरिंग, जानलेवा गड्ढे, बिना योजना के किए गए निर्माण और अवैध अतिक्रमण मौतों के बड़े कारण बन रहे हैं। जब तक लोक निर्माण विभाग, परिवहन विभाग, पुलिस और नगरीय प्रशासन के बीच एक एकीकृत जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक इन दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाना संभव नहीं है।

​दोषी अधिकारियों और ठेकेदारों पर कार्रवाई की मांग

​आशीष शिवहरे ने याचिका के माध्यम से मांग की है कि सड़क निर्माण में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों और ठेकेदारों पर मोटर वाहन अधिनियम की धारा 198A के तहत सख्त कार्रवाई की जाए। याचिका में प्रावधान किया गया है कि यदि सड़क के घटिया डिजाइन या रखरखाव के अभाव में कोई हादसा होता है, तो संबंधित इंजीनियर और ठेकेदार के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होना चाहिए। इसके अलावा याचिका में यह भी मांग की गई है कि जो सड़कें जर्जर स्थिति में हैं या जहां गड्ढों के कारण खतरा बना रहता है, वहां तत्काल प्रभाव से टोल वसूली रोक दी जाए। टोल तभी लिया जाना चाहिए जब सड़क पूरी तरह सुरक्षित और मानक के अनुरूप हो।

​लाइसेंस प्रणाली और सुरक्षा तकनीक में सुधार के सुझाव

​सड़क सुरक्षा के लिए याचिका में कुछ नवाचार और तकनीकी बदलावों की भी पैरवी की गई है। याचिकाकर्ता का सुझाव है कि सभी मौजूदा ड्राइविंग लाइसेंस धारकों के लिए समय-समय पर डिजिटल माध्यम से री-ट्रेनिंग अनिवार्य की जानी चाहिए ताकि उन्हें लेन ड्राइविंग और आधुनिक सड़क संकेतों की जानकारी मिल सके। इसके साथ ही दोपहिया वाहनों में हेलमेट चोरी की समस्या को दूर करने के लिए कंपनियों को वाहनों में ही इन-बिल्ट हेलमेट लॉकर देने हेतु बाध्य करने की मांग की गई है। इससे वाहन चालक हेलमेट साथ रखने में संकोच नहीं करेंगे और सड़क नियमों का पालन बेहतर तरीके से हो सकेगा।

​जनभागीदारी और प्रशासनिक जवाबदेही का नया ढांचा

​हाइवे पर होने वाले हादसों को रोकने के लिए याचिका में एक स्वतंत्र रोड सेफ्टी ऐप बनाने का विचार रखा गया है। इस ऐप के जरिए आम जनता सड़क पर मौजूद खतरनाक गड्ढों, ब्लैक स्पॉट्स और गलत पार्किंग की फोटो अपलोड कर सकेगी, जिस पर त्वरित कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी होगी। इसके साथ ही हाईवे के पास संचालित ढाबों के बाहर अवैध पार्किंग और आवारा पशुओं के कारण होने वाली दुर्घटनाओं के लिए स्थानीय थाना प्रभारी और संबंधित प्रशासन की व्यक्तिगत जवाबदेही तय करने की प्रार्थना की गई है। याचिकाकर्ता के अनुसार सड़क पर होने वाली मौतें केवल आंकड़े नहीं बल्कि टूटते हुए परिवार हैं, जिन्हें व्यवस्था में सुधार करके बचाया जा सकता है।


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