नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने 20 फरवरी शुक्रवार को सुनवाई के बाद उस जनहित याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें बाबर या बाबरी मस्जिद के नाम पर किसी भी नई मस्जिद के निर्माण या नामकरण पर रोक लगाने की मांग की गई थी।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह मामला अदालत के हस्तक्षेप के दायरे में नहीं आता। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की व्यापक रोक लगाने का कोई ठोस कानूनी आधार प्रस्तुत नहीं किया गया है।
मुर्शिदाबाद विवाद का था संदर्भ
याचिका में विशेष रूप से मुर्शिदाबाद जिले में बाबरी मस्जिद नाम से निर्माणाधीन मस्जिद का उल्लेख किया गया था। यह निर्माण हुमायूं कबीर से जुड़ा बताया गया है, जिन्हें तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) ने निलंबित कर दिया था। बेलडांगा इलाके में दिसंबर 2025 में इस मस्जिद की आधारशिला रखी गई थी। बताया जा रहा है कि इसे अयोध्या की मूल बाबरी मस्जिद की तर्ज पर बनाया जा रहा है। परियोजना की अनुमानित लागत 50 से 55 करोड़ रुपये है और दो वर्षों में निर्माण पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
भावनात्मक तर्क अस्वीकार
याचिकाकर्ता ने दलील दी थी कि मुगल शासक बाबर को हिंदू विरोधी आक्रांता माना जाता है, इसलिए उनके नाम पर मस्जिद का निर्माण नहीं होना चाहिए। हालांकि, पीठ ने कहा कि भावनात्मक अपील के आधार पर देशव्यापी प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट भी इस मामले में हस्तक्षेप से इनकार कर चुका है। दिसंबर 2025 में हाईकोर्ट ने कहा था कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। एक अन्य याचिका लोकस स्टैंडी के अभाव में भी खारिज कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद स्पष्ट हो गया है कि मस्जिदों के नामकरण या निर्माण पर सामान्य प्रतिबंध लगाने का प्रश्न न्यायिक दायरे से बाहर माना गया है।
