khabar abhi tak

सुको ने ओबीसी आरक्षण मामले को जबलपुर हाईकोर्ट वापस भेजा, यहीं पर होगी सुनवाई, अंतरिम रोक बरकरार

 
जबलपुर/नई दिल्ली.
आरक्षण मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी संबंधित याचिकाओं को वापस मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय (जबलपुर हाईकोर्ट) भेज दिया है।  साथ ही बढ़े हुए 13 प्रतिशत ओबीसी आरक्षण पर हाईकोर्ट की पुरानी अंतरिम रोक फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ही इस आरक्षण कानून की संवैधानिकता और कानूनी वैधता की विस्तृत जांच करेगा। फिलहाल 13 प्रतिशत अतिरिक्त कोटे पर लगी रोक जारी रहेगी।

मध्यप्रदेश सरकार द्वारा ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत किए जाने के मामले में कानूनी दांव-पेच जारी हैं। राज्य सरकार और ओबीसी वेलफेयर कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने मामले को विस्तार से सुनने के बजाय इसे वापस जबलपुर हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया। अदालत ने कहा कि चूंकि यह मामला राज्य के कानून और संवैधानिक सीमाओं से जुड़ा है, इसलिए हाईकोर्ट को ही इस पर अंतिम फैसला लेने दिया जाए।

एमपी शासन ने की थी मांग

गौरतलब है कि मध्यप्रदेश शासन और ओबीसी वेलफेयर कमेटी ने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम राहत की गुहार लगाई थी। उनकी मुख्य मांग थी कि प्रदेश में 27 फीसदी आरक्षण को लागू माना जाए और कोर्ट के पिछले आदेशों के कारण होल्ड (रुके हुए) 13 फीसदी पदों के परिणामों को अनहोल्ड (जारी) करने की अनुमति दी जाए।

जानिए क्या है 27 प्रतिशत आरक्षण विवाद

विवाद की शुरुआत साल 2019 में हुई थी, जब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने ओबीसी आरक्षण को 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत कर दिया था। इस फैसले के बाद मध्यप्रदेश में कुल आरक्षण की सीमा 63 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा का उल्लंघन माना गया। इसके खिलाफ कई याचिकाएं दायर हुईं, जिसके बाद जबलपुर हाईकोर्ट ने बढ़े हुए 13 प्रतिशत कोटे पर अंतरिम रोक लगा दी थी।

सरकार की दलील, आरक्षण है जरूरी

राज्य सरकार ने तर्क दिया था कि प्रदेश में ओबीसी आबादी को देखते हुए यह आरक्षण जरूरी है। सरकार ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करवाया था ताकि एक बार में फैसला हो सके। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद, सभी पक्ष फिर से जबलपुर हाईकोर्ट में अपनी दलीलें पेश करेंगे। हाईकोर्ट यह जांचेगा कि क्या राज्य सरकार के पास 50 प्रतिशत की सीमा लांघने का कोई ठोस संवैधानिक आधार है।

अनारक्षित वर्ग की ये है आपत्ति

अनारक्षित वर्ग के अधिवक्ता अमन लेखी, शंकर नारायण, शंकर जैन ने विरोध किया। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ का मामला अलग है। छत्तीसगढ़ में रिजल्ट आ गया और नियुक्ति दे दी गई है, लेकिन मध्यप्रदेश में ऐसा नहीं हुआ है। मध्यप्रदेश शासन से नियुक्त विशेष अधिवक्ता नटराजन ने भी इसमें अंतरिम राहत की मांग की है।

Post a Comment

Previous Post Next Post
khabar abhi tak
khabar abhi tak
khabar abhi tak