जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में कार्यरत डिप्टी रजिस्ट्रार, अस्पताल प्रबंधक और बायोमेडिकल इंजीनियरों की सेवा शर्तों से जुड़ी शिकायतों पर कड़ा रुख अपनाया है। न्यायमूर्ति मनिंदर सिंह भट्टी की एकलपीठ ने लोक स्वास्थ्य एवं मेडिकल एजुकेशन विभाग के आयुक्त को निर्देशित किया है कि वे इन पदों पर नियुक्ति और वेतन विसंगतियों का निराकरण 15 दिनों के भीतर सुनिश्चित करें।
वेतन वृद्धि और सीपीआई प्रावधान पर विवाद
याचिकाकर्ताओं की ओर से पैरवी करते हुए अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सेवा शर्तों के मुताबिक कर्मचारियों के वेतन में वार्षिक दो प्रतिशत की वृद्धि होनी चाहिए। विवाद तब शुरू हुआ जब विभाग द्वारा जारी नए विज्ञापन में वेतन वृद्धि के लिए आधार माने जाने वाले 'उपभोक्ता मूल्य सूचकांक' के प्रावधान को ही हटा दिया गया। याचिका में आरोप लगाया गया है कि प्रशासन ने बिना किसी नए नियम के पुराने लाभों को समाप्त कर दिया है।
2018 के नियमों की अनदेखी का आरोप
सुनवाई के दौरान यह दलील दी गई कि विभाग द्वारा वर्ष 2018 में बनाए गए भर्ती और सेवा नियमों का पालन नहीं किया जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार ने न तो नए नियम स्पष्ट किए हैं और न ही पुराने नियमों के तहत मिल रहे लाभ जारी रखे हैं। 28 कर्मचारियों द्वारा दायर इस याचिका में मांग की गई है कि उनकी नियुक्तियों को नियमों के दायरे में लाया जाए और कटौती किए गए वित्तीय लाभों को बहाल किया जाए।
15 दिन के भीतर निराकरण के आदेश
मामले के सभी पहलुओं को सुनने के बाद, हाई कोर्ट ने लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग के आयुक्त को एक निश्चित समय सीमा में निर्णय लेने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 15 दिनों के भीतर इन विसंगतियों को दूर कर याचिकाकर्ताओं की शिकायतों का निपटारा किया जाए। इस फैसले से प्रदेश के विभिन्न जिलों में कार्यरत दर्जनों अस्पताल प्रबंधकों और इंजीनियरों को न्याय की उम्मीद जगी है।
