नई दिल्ली. सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों के हक में सर्वोच्च न्यायालय ने एक सुप्रीम फैसला सुनाया है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया है कि महंगाई भत्ता (डीए) कोई बोनस या अतिरिक्त लाभ नहीं है, बल्कि यह कर्मचारियों का कानूनी अधिकार है। इस ऐतिहासिक निर्णय के बाद अब मध्यप्रदेश समेत देखभर के लाखों पेंशनरों ने भी प्रदेश सरकार से वर्षों से लंबित बकाया राशि की मांग की है।
महंगाई भत्ते पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
दरअसल, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा दायर एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारी संघों के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिनमें वित्तीय बोझ का हवाला दिया गया था। कोर्ट ने दो टूक कहा कि महंगाई भत्ता कर्मचारी की सेवा शर्तों का हिस्सा है और इसे रोकना अनुचित है। यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य के कर्मचारी अपने पूरे बकाया महंगाई भत्ता पाने के हकदार हैं। न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को आदेश दिया है कि वह अपने कर्मचारियों और पेंशनरों को साल 2008 से 2019 तक का पूरा बकाया महंगाई भत्ता अनिवार्य रूप से चुकाए। भुगतान की प्रक्रिया और वित्तीय जटिलताओं को सुलझाने के लिए कोर्ट ने एक उच्च स्तरीय समिति का भी गठन किया है।
समिति में ये दिग्गज शामिल
सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है, जिसके सदस्य जस्टिस इंदु मल्होत्रा (पूर्व न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट), जस्टिस तरलोक सिंह चौहान (पूर्व मुख्य न्यायाधीश, हाई कोर्ट), जस्टिस गौतम भादुड़ी (पूर्व न्यायाधीश, हाई कोर्ट), वरिष्ठ अधिकारी (भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा नामित)
पेंशनरों ने उठाई 95 माह के बकाये की मांग
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का असर अब मध्यप्रदेश में भी दिखने लगा है। पेंशनर्स वेलफेयर एसोसिएशन के संरक्षक गणेश दत्त जोशी और प्रदेश अध्यक्ष आमोद सक्सेना ने इस निर्णय का स्वागत किया है। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश के पेंशनरों का पिछले लगभग 95 महीनों का महंगाई राहत (डीआर) बकाया है, जिसका भुगतान सरकार को तुरंत करना चाहिए।
धारा 49 की आड़ में हो रहा आर्थिक शोषण
एसोसिएशन के अध्यक्ष आमोद सक्सेना ने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश राज्य पुनर्गठन अधिनियम 2000 की धारा 49 का बहाना बनाकर पिछले 25 वर्षों से मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की सरकारें पेंशनरों का आर्थिक शोषण कर रही हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल बंगाल, बल्कि पूरे देश के कर्मचारियों और पेंशनरों पर समान रूप से लागू होता है।
