जबलपुर। खाकी के महकमे में रौब की अपनी एक अलग ही भूख होती है, लेकिन जब एक अदना सा आरक्षक खुद को सूबे के तमाम पुलिस अधीक्षकों (SP) का 'सुपर बॉस' समझ बैठे, तो किस्सा सिर्फ अनुशासनहीनता का नहीं, बल्कि विशुद्ध प्रशासनिक हास्य का बन जाता है। जबलपुर स्थित मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के महाधिवक्ता कार्यालय में पदस्थ आरक्षक संदीप रघुवंशी ने कुछ ऐसा ही कारनामा कर दिखाया। साहब ने सरकारी लेटरहेड उठाया, महाधिवक्ता कार्यालय की मुहर का वज़न महसूस किया और एक झटके में मध्य प्रदेश के सभी ज़िलों के पुलिस कप्तानों को ईमेल दाग दिया। फरमान भी ऐसा-वैसा नहीं, बल्कि कड़क लहजे में सख्त ताकीद की कि दो दिन के भीतर अपने सीयूजी मोबाइल नंबर अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराएं!"
जब प्यादे ने चला वज़ीर वाला दांव
सिपाही जी को गृह विभाग ने महज़ इसलिए भेजा था ताकि अदालती मामलों में विभागों के बीच 'हैलो-हाय' और कागज़ों की आवाजाही बनी रहे। मगर आरक्षक महोदय के भीतर का प्रशासनिक हुक्मरान शायद जाग चुका था। उन्होंने ज़िला कप्तानों को बाकायदा समझाया कि हाईकोर्ट में लंबित मुकदमों, ज़मानत याचिकाओं, स्थानीय सत्यापन रिपोर्टों और नोटिस तामीली में तेज़ी लानी है। लगे हाथ पुलिस अधीक्षकों के रीडर और ज़िले की विधिक शाखा के प्रभारियों के नंबर भी मांग लिए, ताकि 'कामकाज में ढिलाई' न रहे। ज़िलों के पुलिस कप्तान भी एक पल को चौंक गए होंगे कि रातों-रात ऐसा कौन सा नया 'डीजीपी' महाधिवक्ता कार्यालय में बैठ गया, जो कप्तानों को 48 घंटे की मोहलत देकर फोन नंबर मांग रहा है। सिपाही ने समन्वय (कोऑर्डिनेशन) की जिम्मेदारी को सीधे नियंत्रण (कंट्रोल) समझ लिया और भाषा ऐसी चुनी, मानो गृह मंत्रालय का कोई कड़क फरमान जारी हुआ हो।
'सुपरकॉप' की उड़नपरी ज़मीन पर, नो-एंट्री के साथ घर वापसी
जब यह 'शाही फरमान' महाधिवक्ता कार्यालय के आला अफसरों की नज़र में आया, तो वहां हड़कंप मच गया। जिस लेटरहेड की गरिमा का ध्यान बड़े-बड़े विधिक महारथी रखते हैं, उस पर एक आरक्षक सूबे की पुलिस को हांकने निकला था। इसे घोर कदाचरण, मनमानी और मर्यादा की सीमा लांघना करार देते हुए तुरंत चाबुक चला दिया गया। कार्रवाई इतनी तेज़ हुई कि सिपाही जी के महाधिवक्ता कार्यालय परिसर में घुसने पर तत्काल प्रभाव से 'नो-एंट्री' का बोर्ड लटका दिया गया। एसपी रेडियो सुनील राजोरे को पत्र भेजकर आरक्षक की रवानगी उसके मूल रेडियो विभाग में कर दी गई। संदेश साफ था कि आपकी मेज़ वहीं ठीक है, जहां सिर्फ वॉकी-टॉकी की खरखराहट सुननी हो, कप्तानों को नोटिस भेजने की नहीं। वहीं, न्यायालयीन कार्यों की साख बचाने के लिए अब पूरे समन्वय की ज़िम्मेदारी एक डीएसपी स्तर के राजपत्रित अधिकारी को सौंपी गई है, ताकि अगली बार कोई प्यादा खुद को शहंशाह समझकर पूरी बिसात ही न पलट दे।
