जबलपुर। कठौंदा स्थित 33 केवी सबस्टेशन में रोजाना फाल्ट आना अब एक आम बात बन चुकी है। पूरे शहर को छोड़कर केवल इसी केंद्र में बार-बार खराबी आ रही है, जिससे खजरी खिरिया औद्योगिक क्षेत्र के सैकड़ों उद्यमी खून के आंसू रोने को विवश हैं। 24 घंटे में 10 से 15 दफा अचानक बत्ती गुल होने से त्रस्त व्यापारी अब भोपाल जाकर मुख्यमंत्री के समक्ष इस चरमराई व्यवस्था की पोल खोलने की तैयारी कर चुके हैं। अधीक्षण यंत्री सिटी संजय अरोरा, विजयनगर डीई अमित सक्सेना, एई सुनील ठाकुर और जेई सुनील पटेल ने कारोबारियों की लगातार शिकायतों को पूरी तरह अनसुना कर दिया है। निचले अमले की इस खुली मनमानी और संवेदनहीनता से सारा औद्योगिक इलाका अंधेरे में डूबा रहता है। हालांकि चीफ इंजीनियर एसके गिरिया ने इस गंभीर लापरवाही पर कड़ी कार्रवाई का भरोसा दिया है, मगर जमीनी स्तर पर कोई सुधार नहीं दिख रहा है।
अचानक ट्रिपिंग से कच्चा माल बन रहा कचरा
ऑटोमैटिक प्लांट में चलती मशीनों के अचानक रुकने से अंदर फंसा कच्चा माल पलक झपकते ही पूरी तरह रद्दी हो जाता है। इस अप्रत्याशित व्यवधान के कारण कारखानों को हर रोज लाखों का सीधा आर्थिक फटका लग रहा है। कार्यशालाओं में तैनात दिहाड़ी मजदूर बिजली न रहने से दिनभर निठल्ले बैठे रहते हैं। काम पूरी तरह बंद रहने के बावजूद मालिकों को अपनी जेब से पूरी मजदूरी चुकानी पड़ रही है। इस रुकावट से बाजार में तैयार माल भेजने की समय सीमा लगातार टूट रही है।
डीजल फूंकने से लागत का बिगड़ा गणित
उत्पादन चालू रखने की खातिर उद्यमियों को भारी कीमत चुकाकर जनरेटर के लिए रोजाना तेल खरीदना पड़ रहा है। अपनी बचत पूंजी का बड़ा हिस्सा सिर्फ ईंधन जुटाने में स्वाहा होने से उत्पादों की लागत बेतहाशा बढ़ गई है। बाजार में तय भाव पर माल बेचना अब बिल्कुल भी मुमकिन नहीं रह गया है। इस आर्थिक बोझ ने छोटे उद्यमियों की कमर तोड़ दी है, जिसके चलते कई लोगों ने अपनी इकाइयां हमेशा के लिए बंद करने का मन बना लिया है।
वसूली में तेजी पर मेंटेनेंस में फिसड्डी
बिल जमा करने की आखिरी तारीख बीतते ही लाइन काटने दौड़ने वाला मैदानी दस्ता तकनीकी सुधार के वक्त गायब हो जाता है। ब्रेकडाउन या तार टूटने की शिकायत लेकर जब कोई फोन लगाता है तो दफ्तर में घंटी बजती रहती है या फिर झूठे बहाने बना दिए जाते हैं। ऊर्जा महकमे के जिम्मेदार अफसरों ने सेवा देने के सारे सरकारी नियम कायदों को ताक पर रख दिया है। इनका एकमात्र लक्ष्य उपभोक्ताओं से राजस्व ऐंठना रह गया है, काम देना नहीं।
अफसरों की नाकामी की भोपाल में गूंज
स्थानीय स्तर पर तैनात जिम्मेदारों की खोखली दलीलों और वादों से तंग आकर अब उद्यमियों का सब्र टूट चुका है। जिले के तकनीकी तंत्र से राहत की उम्मीद खत्म होने के बाद अब राज्य शासन के शीर्ष स्तर पर दखल कराने की पुख्ता रणनीति बन चुकी है। प्रभावित कारखानेदारों ने विद्युत विभाग की इस बदहाली के पुख्ता प्रमाण जुटा लिए हैं। मनमाने ढर्रे को खत्म कराने के लिए यह पूरा मामला अब सीधे मंत्रालय की चौखट पर पेश किया जाएगा।
