जबलपुर। शहर में पेयजल आपूर्ति व्यवस्था गंभीर संकट में फंस चुकी है, जहां 60 से 80 प्रतिशत मुख्य पाइप लाइनें गंदे नालों और नालियों के बीच से गुजर रही हैं। इतना ही नहीं, कुल 1700 किमी नेटवर्क में से 20 प्रतिशत यानी 340 किमी पुरानी भूमिगत पाइप लाइनों का नगर निगम के पास कोई दस्तावेजी रिकॉर्ड ही उपलब्ध नहीं है। इस बड़ी प्रशासनिक अनदेखी को उजागर करते हुए नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. पीजी नाजपांडे के नेतृत्व में रजत भार्गव, एड. वेदप्रकाश अधौलिया, टीके रायघटक, सुभाष चन्द्रा, अशोक यादव, यशवंत कोष्टा तथा श्याम सोलंकी ने आवाज उठाई है। मंच सदस्यों ने बताया कि निगमायुक्त से विगत 5 दिनों से संपर्क का प्रयास किया जा रहा था, लेकिन उन्होंने खुद चर्चा न करते हुए अतिरिक्त कमिश्नर वीएन बाजपेयी को भेजा, जिससे कोई सार्थक हल नहीं निकला।
अमृत योजना से पहले नहीं बना कोई नक्शा
अमृत 1.0 परियोजना से पूर्व नगर निगम ने जमीन के भीतर बिछी पेयजल लाइनों का कोई वैज्ञानिक डेटा अथवा नक्शा नहीं बनाया था। इसी भारी चूक के चलते कहीं भी रिसाव या खराबी आने पर कर्मचारियों को केवल अनुमान के आधार पर सड़कों की खुदाई करनी पड़ रही है। सही जगह की जानकारी न होने के कारण लीकेज तलाशने में काफी समय लगता है और इस दौरान भारी मात्रा में पानी व्यर्थ बह जाता है।
दूषित जलापूर्ति से रहवासियों पर मंडरा रहा खतरा
नालियों में डूबी पुरानी एवं जर्जर पाइप लाइनों की वजह से आबादी तक दूषित व बदबूदार पानी पहुंचने की गंभीर आशंका निरंतर बनी हुई है। इसके बावजूद नगर निगम प्रशासन के पास नालों से गुजरने वाली इन खतरनाक लाइनों को हटाने अथवा बदलने की कोई कार्ययोजना मौजूद नहीं है। इस व्यवस्था को सुधारने के लिए अब तक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तक नहीं बनाई गई है। प्रशासनिक उदासीनता के कारण शहरवासी दूषित जल पीने को विवश हैं और संक्रामक बीमारियों का खतरा बढ़ रहा है।
