जबलपुर। नगर निगम प्रशासन कर वसूली के मामले में दोहरा रवैया अपना रहा है। आम करदाताओं से संपत्ति कर, जल कर और डोर टू डोर कचरा शुल्क वसूलने के लिए लोक अदालत और कुर्की जैसे कड़े कदम उठाए जाते हैं, वहीं सरकारी संस्थानों और कार्यालयों पर बकाया करोड़ों रुपयों को लेकर चुप्पी साधी हुई है। स्थिति यह है कि शहर के केवल रांझी उपनगरीय इलाके में ही आधा दर्जन से अधिक प्रमुख सरकारी प्रतिष्ठान सालों से टैक्स दबाए बैठे हैं। इनमें ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय, बिजली कंपनी का सहायक यंत्री कार्यालय, न्यू स्टेडियम, शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय परिसर स्थित एसबीआई शाखा, मिनी विक्टोरिया अस्पताल गोकलपुर, नई तहसील कार्यालय गोकलपुर और इनडोर स्टेडियम शामिल हैं। निगम के अफसर इन रसूखदार महकमों पर नोटिस भेजने या दबाव बनाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।
शासकीय दफ्तरों पर लाखों रुपयों का बकाया फंसा
निगम के राजस्व खाते में सरकारी विभागों से भारी रकम आनी शेष है, मगर मैदानी अमला यहां वसूली के लिए कदम रखने से कतराता है। अकेले रांझी क्षेत्र के आंकड़ों पर नजर डालें तो न्यू स्टेडियम रांझी पर सबसे अधिक 13 लाख रुपये का टैक्स बकाया है। इसके साथ ही बिजली वितरण कंपनी के सहायक यंत्री कार्यालय की देनदारी 8 लाख 15 हजार रुपये तक पहुंच चुकी है। इसी प्रकार शासकीय इंजीनियरिंग महाविद्यालय परिसर में संचालित भारतीय स्टेट बैंक की शाखा पर 7 लाख 14 हजार रुपये का कर बाकी है। स्वास्थ्य और प्रशासनिक सेवाएं दे रहे मिनी विक्टोरिया अस्पताल गोकलपुर रांझी पर 2 लाख 58 हजार रुपये और नई तहसील कार्यालय गोकलपुर पर 1 लाख 80 हजार रुपये की देयता दर्ज है। इसके अलावा ज्ञानोदय आवासीय विद्यालय रांझी पर 2 लाख 77 हजार रुपये तथा इनडोर स्टेडियम रांझी पर 84 हजार 137 रुपये निगम को लेने हैं।
आम जनता में पक्षपातपूर्ण रवैये से भारी असंतोष
इन तमाम सरकारी कार्यालयों और संस्थानों द्वारा नगर निगम की बुनियादी सेवाओं का भरपूर उपयोग प्रतिदिन किया जा रहा है। वे पानी की आपूर्ति ले रहे हैं और सफाई व्यवस्था का लाभ भी उठा रहे हैं, लेकिन जब इसके बदले वैधानिक टैक्स चुकाने की बारी आती है तो बजट न होने का बहाना बनाकर भुगतान टाल दिया जाता है। दूसरी तरफ यदि किसी सामान्य नागरिक का मामूली कर भी बाकी रह जाए तो निगम का अमला फौरन नल कनेक्शन काटने, जब्ती करने अथवा कानूनी कार्रवाई की चेतावनी थमाने पहुंच जाता है। निगम प्रशासन की यह पक्षपातपूर्ण कार्यप्रणाली अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुकी है। करदाता यह सवाल उठा रहे हैं कि नियम और कानून केवल कमजोर तबके के लिए ही क्यों लागू होते हैं और सरकारी तंत्र से बकाया राशि वसूलने में निगम के हाथ-पांव क्यों फूल जाते हैं।
