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धीरेंद्र शास्त्री के भाई की जमानत पर कानून का शिकंजा या राहत !

 




जबलपुर। बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के अनुज शालिग्राम गर्ग उर्फ छोटे सरकार की जानलेवा हमले से जुड़ी नियमित जमानत अर्जी पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर मुख्य पीठ ने दोनों पक्षों के तर्कों का परिशीलन कर अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की एकलपीठ के समक्ष अभियोजन ने अपराध की भीषणता, जप्तशुदा असलहे और आहत की चिकित्सीय स्थिति के आधार पर रिहाई पर कड़ा ऐतराज जताया। दूसरी तरफ बचाव पक्ष के वकीलों ने समस्त लांछनों को निराधार, द्वेषपूर्ण और झूठी रंजिश का ताना-बाना बताते हुए मुवक्किल को निर्दोष निरूपित किया। विदित हो कि छतरपुर जिला न्यायालय द्वारा पूर्व में ही उनकी जमानत निरस्त की जा चुकी है, जिसके उपरांत उच्च न्यायालय की शरण ली गई।

​विवाद के बाद मोतीलाल कुशवाहा पर चली थी गोली

​छतरपुर जिले के राजनगर थाने में दर्ज अपराध क्रमांक 184/2026 के अनुसार यह वारदात 14 जुलाई 2026 की है। शिकायतकर्ता मोतीलाल कुशवाहा को कुछ लोगों ने बरगद के चबूतरे पर यह संदेश देकर तलब किया था कि छोटे सरकार ने बुलाया है। वहां काले रंग के चार पहिया वाहन के साथ मौजूद शालिग्राम से उनकी कहासुनी शुरू हुई। गाली-गलौज के बीच तीन अज्ञात साथियों ने लाठियों से प्रहार कर दिया। इसी दरमियान शालिग्राम ने पिस्टल पेट से सटाकर ट्रिगर दबा दिया। गोली सीने के निचले भाग में धंसते ही आहत जमीन पर गिर पड़े। उन्हें प्राथमिक उपचार हेतु जिला चिकित्सालय छतरपुर भेजा गया, जहां से स्थिति नाजुक होने पर चिकित्सकों ने ग्वालियर स्थानांतरित कर दिया। जांच दल ने मामले में बीएनएस की धारा 109(1), 296(बी), 351(3), 3(5) सहित आर्म्स एक्ट की धारा 25 व 27 का इजाफा किया है।

​हथियार जब्ती और पुराने मुकदमों पर छिड़ी तीखी बहस

​सुनवाई के दौरान सरकारी पक्ष ने घटना में प्रयुक्त पिस्टल की शालिग्राम से बरामदगी, केस डायरी और मेडिकल रिपोर्ट को अपनी आपत्ति का प्रमुख आधार बनाया। प्रत्युत्तर में बचाव पक्ष ने बरामदगी की सत्यता को सिरे से खारिज करते हुए दावा किया कि घटनास्थल से कोई हथियार नहीं मिला तथा पुलिस ने दबाववश झूठा पंचनामा तैयार किया। अधीनस्थ अदालत के खारिज आदेश में पूर्व के आपराधिक रिकॉर्ड का भी विवरण है, जिसमें अपराध क्रमांक 64/2023 में दोषमुक्ति दर्ज है, जबकि अपराध क्रमांक 229/2024 एवं 89/2024 वर्तमान में विचाराधीन हैं। क्षेत्रीय परिवेश में दहशत और आरोपों की गुरुता के चलते निचली अदालत ने राहत देने से इनकार किया था। अब न्यायपीठ के अंतिम निर्णय से ही यह तय होगा कि आवेदक को जेल से मुक्ति मिलेगी अथवा सलाखों के पीछे ही रहना होगा।

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