जबलपुर। प्रदेश भर में 22 सितंबर 2025 से लागू जीएसटी 2.0 व्यवस्था के बाद सस्ती बिजली मिलने का दावा पूरी तरह विफल साबित हुआ है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रमुख सदस्यों डॉ. पी.जी. नाजपांडे, रजत भार्गव, एड. वेदप्रकाश अधौलिया, मनीष शर्मा, सुशीला कनौजिया, गीता पांडे, यशवंत कोष्टा, अशोक यादव और श्याम सोलंकी ने विद्युत नियामक आयोग को आधिकारिक ईमेल प्रेषित कर अपना कड़ा एतराज जताया है।
मंच का स्पष्ट मत है कि शासन स्तर पर कोयले पर जीएसटी 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत करने के साथ 400 रुपया प्रति टन कम्पेन्सेशन सेस हटाया गया था, जिससे ईंधन लागत घटने पर टैरिफ में 22 पैसे प्रति यूनिट की कमी तय थी, परंतु वास्तविकता में यह राहत सिरे से गायब रही।
मासिक गणना में सामने आया वसूली का सच
ईंधन लागत समायोजन के विस्तृत विश्लेषण से यह प्रमाणित हुआ है कि राहत देने के बजाय नियामक तंत्र ने वित्तीय भार बढ़ाया है। मानक गणना के आधार पर फ्यूल सरचार्ज का स्तर शून्य से नीचे अथवा 1 प्रतिशत तक सीमित रहना चाहिए था, मगर वास्तविक औसत 3.32 प्रतिशत निकाला गया। वर्ष 2026 के प्रारंभिक माह जनवरी में यह 1.58 प्रतिशत निर्धारित हुआ। फरवरी माह में यह गिरकर माइनस 1.71 प्रतिशत तथा मार्च में माइनस 0.63 प्रतिशत दर्ज हुआ। इसके तुरंत बाद अप्रैल में तीव्र उछाल के साथ 5.36 प्रतिशत दर्ज किया गया। मई में यह 3.91 प्रतिशत, जून में 1.11 प्रतिशत, जुलाई में 3.77 प्रतिशत और अगस्त में 4.59 प्रतिशत तक पहुंच गया। निरंतर बढ़ते इस वित्तीय बोझ से आम जनता में तीव्र नाराजगी है, जिसके चलते मंच ने नियामकीय हस्तक्षेप की मांग उठाई है।
