महाराज श्री ने बताया कि अर्जुन के मन में यह प्रश्न उठता है कि यदि ज्ञान कर्म से श्रेष्ठ है, तो फिर उसे कर्म करने के लिए क्यों प्रेरित किया जा रहा है। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के इस संशय को दूर करते हुए स्पष्ट करते हैं कि केवल कर्मों का त्याग कर देने से मनुष्य कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो सकता। उन्होंने कहा कि गीता के तीसरे अध्याय का आरंभ ही एक महत्वपूर्ण जीवन-संदेश देता है—मनुष्य कर्म किए बिना एक क्षण भी नहीं रह सकता। प्रकृति के तीनों गुण मनुष्य को निरंतर कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए कर्म से भागना समाधान नहीं है, कर्म के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलना ही समाधान है। महाराज जी ने श्लोक की व्याख्या करते हुए कहा कि अर्जुन का प्रश्न आज के मनुष्य का भी प्रश्न है। आज भी व्यक्ति सोचता है कि आध्यात्मिक जीवन अपनाने के लिए संसार के कर्तव्यों को छोड़ देना चाहिए। श्रीकृष्ण बताते हैं कि सच्चा अध्यात्म कर्तव्य से पलायन नहीं, बल्कि कर्तव्य को ईश्वरार्पण करने में है। इस मौके पर महाराज श्री का पूजन प्रणव पाठक, दिलीप चतुर्वेदी, एस के चौरसिया, उमेश पिल्ले, अटल बिहारी, अलभ्य बाजपेयी, भानु नवेरिया, बालकृष्ण अग्रवाल, नलिन पांडेय, रमेश नवेरिया, मनीष दुबे आदि ने किया। पूजन पंडित रोहित दुबे, पंडित सौरभ दुबे ने सम्पन्न कराया।
जबलपुर। श्रीमद्भगवद्गीता के तृतीय अध्याय कर्मयोग के प्रथम पांच श्लोकों की व्याख्या करते हुए परमहंस गिरीशानंद सरस्वती महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में कर्म से पलायन नहीं, बल्कि कर्म को भगवान के प्रति समर्पित करते हुए निष्काम भाव से करना ही सच्चा मार्ग है। उक्ताशय के विचार महाराज श्री ने गौरीघाट साकेत धाम में व्यक्त किए।
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