जबलपुर। नेताजी सुभाषचंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के प्रवेश को लेकर भारी अनियमितताओं का मामला सामने आया है। आरोप है कि बिना किसी आधिकारिक नियमावली और स्वायत्त समिति की मंजूरी के ही कॉलेज प्रबंधन ने छात्रों को प्रवेश दे दिया। आमतौर पर किसी भी शैक्षिक पाठ्यक्रम को शुरू करने के लिए पात्रता, शुल्क निर्धारण, चयन प्रक्रिया और संसाधन संबंधी नियम तय करना अनिवार्य होता है, लेकिन यहां पूरी प्रक्रिया ही उल्टी चलती दिखाई दी। प्रवेश पहले दे दिए गए और नियम बनाने की औपचारिकताएं अब तक पूरी नहीं हुई हैं। इस मामले ने न केवल प्रशासनिक लापरवाही को उजागर किया है, बल्कि हजारों छात्रों के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। अब यह बड़ा सवाल है कि जब पाठ्यक्रम के संचालन के लिए आधारभूत ढांचा और नियमावली ही अस्तित्व में नहीं थी, तो प्रवेश की प्रक्रिया किस आधार पर संचालित की गई।
बिना नियम तय किए प्रवेश प्रक्रिया क्यों शुरू हुई
किसी भी संस्थान में प्रवेश प्रक्रिया शुरू होने से पहले उसकी कानूनी और प्रशासनिक रूपरेखा तैयार होना अनिवार्य होता है। मेडिकल कॉलेज प्रबंधन पर आरोप है कि उन्होंने स्वायत्त समिति को अंधेरे में रखकर यह पूरा खेल खेला है। नियमावली न होने के कारण यह स्पष्ट नहीं है कि छात्रों का चयन किस आधार पर किया गया, फीस किस मानक के तहत ली गई और प्रवेश की वैधता किस आदेश पर टिकी है। क्या प्रबंधन ने जल्दबाजी में नियमों को जानबूझकर नजरअंदाज किया या फिर इसमें किसी उच्च स्तरीय मिलीभगत का खेल है, यह जांच का विषय है। मेडिकल कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में इस तरह की प्रक्रियात्मक चूक सीधे तौर पर जवाबदेही पर प्रहार करती है।
स्वायत्त समिति की मंजूरी को दरकिनार क्यों किया
पैरामेडिकल पाठ्यक्रमों के संचालन के लिए अधोसंरचना, प्रयोगशाला, प्रशिक्षण सुविधा और भूमि संबंधी मानकों का पालन करना अनिवार्य होता है। सूत्रों के अनुसार, इन पाठ्यक्रमों के लिए जरूरी प्रस्ताव स्वायत्त समिति के समक्ष विधिवत रूप से प्रस्तुत ही नहीं किए गए थे। यदि प्रस्ताव समिति के पास नहीं थे, तो फिर प्रवेश के लिए विज्ञापन जारी करने और सीटों के आवंटन का निर्णय किसने लिया। कैंपस में 5 एकड़ भूमि और अन्य संसाधनों की उपलब्धता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या निरीक्षण हुआ था और क्या संसाधनों का प्रमाण रिकॉर्ड में मौजूद है, यह एक रहस्य बना हुआ है। अब छात्र और अभिभावक जानना चाहते हैं कि भविष्य से जुड़े इस संवेदनशील मसले पर कॉलेज प्रबंधन और डीन स्तर के अधिकारी कब स्थिति स्पष्ट करेंगे।
जवाबदेही तय करने के लिए अब जांच जरूरी
पूरे मामले पर मेडिकल कॉलेज के डीन डॉक्टर नवनीत सक्सेना का कहना है कि पैरामेडिकल पाठ्यक्रम की नियमावली बनाने की प्रक्रिया भोपाल स्तर से होती है और स्थानीय स्तर पर कोई नियम नहीं बनाए जाते। हालांकि, यह तर्क प्रवेश की प्रक्रिया शुरू करने की जल्दबाजी को उचित नहीं ठहराता। प्रशासनिक हलकों में अब इस मामले की उच्च स्तरीय और पारदर्शी जांच की मांग तेज हो गई है। यह देखा जाना आवश्यक है कि नियमावली बने बिना प्रवेश के लिए आदेश किसने जारी किए और किन अधिकारियों ने नियमों की अनदेखी को अपनी स्वीकृति दी। यदि इस मामले में केवल फाइलों को दबाने का काम किया गया तो छात्रों का शैक्षणिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
