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मेडिकल यूनिवर्सिटी का विभाजन:उज्जैन जबलपुर से छोटा,लेकिन दिये ज्यादा जिले



जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के बंटवारे पर फूटा गुस्सा, सरकार की मनमानी के खिलाफ कड़ा निंदा प्रस्ताव पारित

जबलपुर। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच द्वारा आयोजित बैठक में 15 वर्ष पुरानी जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के बंटवारे को लेकर राज्य सरकार की नीतियों पर गहरी नाराजगी जताई गई और निंदा प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें डॉ. पी.जी. नाजपांडे, रजत भार्गव, टी.के. रायघटक, एड. वेदप्रकाश अधौलिया, सुशीला कनौजिया, गीता पाण्डे, डी.के. सिंह, पी.एस. राजपूत, मनीष शर्मा, संतोष श्रीवास्तव, रेखा झारिया तथा राममिलन शर्मा शामिल रहे, जहाँ यह कहा गया कि क्षेत्रफल और जनसंख्या में उज्जैन से बड़े होने के बावजूद जबलपुर के हिस्से में केवल 24 जिले आए जबकि छोटे शहर उज्जैन को यूनिवर्सिटी देकर उसके परिधि में 31 जिले शामिल किए गए और इस पूरे मामले में राज्यसभा सदस्य एड. विवेक तन्खा तथा विधायक लखन घनघोरिया के विरोध को अनसुना कर दिया गया।जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी के बंटवारे को लेकर नागरिकों और विभिन्न संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के बैनर तले कॉफी हाउस में एक विशेष बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक की तारीख 22 जुलाई 2026 तय की गई थी, जिसमें शहर के विकास और उसकी साख बचाने को लेकर गंभीर चर्चा की गई। बैठक में उपस्थित वक्ताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि जबलपुर मेडिकल यूनिवर्सिटी 15 वर्ष पुरानी है और क्षेत्रफल तथा जनसंख्या के मामले में उज्जैन से काफी बड़ी है। इसके बावजूद जब यूनिवर्सिटी का बंटवारा किया गया, तो न्याय करने के बजाय मनमाना रवैया अपनाया गया। उज्जैन जैसे छोटे शहर को यूनिवर्सिटी का मुख्यालय बनाकर उसके दायरे में 31 जिले शामिल कर दिए गए, जबकि बड़े शहर जबलपुर के हिस्से में केवल 24 जिले ही आए। इस तरह का भेदभाव किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जा सकता है और यह सरकार की स्पष्ट मनमानी को दर्शाता है।

​सत्ता पक्ष के जनप्रतिनिधियों की चुप्पी बेहद चिंताजनक

​बैठक में इस बात पर भी विशेष रूप से चिंता व्यक्त की गई कि जबलपुर के विकास और उसकी साख को बचाने के लिए आगे आने वाला सत्ता पक्ष का कोई भी नेता या जनप्रतिनिधि आज खुलकर सामने नहीं आ रहा है। उनकी यह खामोश चुप्पी इस पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना देती है। जब जनता के प्रतिनिधि ही शहर के हितों की रक्षा करने में असफल हो जाएं, तो आम नागरिकों का भरोसा डगमगाने लगता है। इस अन्यायपूर्ण फैसले के खिलाफ जब राज्यसभा सदस्य एड. विवेक तन्खा तथा स्थानीय विधायक लखन घनघोरिया ने अपनी ओर से विरोध दर्ज कराया और आवाज उठाई, तब उनकी बात को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया और अनसुना कर दिया गया। किसी भी जनप्रतिनिधि या बड़े नेता ने इस मामले में सकारात्मक पहल नहीं की, जिससे शहर के लोगों में निराशा और गुस्सा दोनों बढ़ रहा है।

​छोटे शहर को ज्यादा जिले देना सरासर मनमानी

​सरकार के इस एकतरफा और अदूरदर्शी निर्णय के कारण जबलपुर शहर की महत्ता और उसकी पुरानी साख को गहरा धक्का लगा है। बैठक के दौरान उपस्थित सभी प्रमुख सदस्यों ने एक स्वर में सरकार के इस कदम की कड़ी निंदा की और सर्वसम्मति से निंदा प्रस्ताव पारित किया। सभी का यही कहना था कि यदि समय रहते इस अन्यायपूर्ण बंटवारे में सुधार नहीं किया गया, तो आम जनता और विभिन्न उपभोक्ता संगठन मिलकर एक बड़ा जन आंदोलन खड़ा करने के लिए बाध्य होंगे, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन और प्रशासन की होगी।

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