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मूंग खरीदी में नया खेल: विवादित गोदामों की फिर हुई चांदी



जबलपुर। जिले में समर्थन मूल्य पर मूंग उपार्जन की प्रक्रिया शुरू होते ही मझौली और पाटन क्षेत्रों में भ्रष्टाचार के पुराने साये फिर से मंडराने लगे हैं। जिला प्रशासन द्वारा मूंग खरीदी के लिए अधिकृत किए गए 10 केंद्रों में से मझौली स्थित पिताश्री वेयरहाउस का चयन विवादों में है। इस गोदाम का संबंध अमित पवार के उस सिंडिकेट से है, जिसका सियाराम वेयरहाउस 2023 के बड़े मूंग घोटाले के चलते जांच के घेरे में है। वहीं पाटन तहसील के किसानों को भारी असुविधा में डालते हुए उपार्जन केंद्र को दूर कटंगी क्षेत्र के रुद्रास वेयरहाउस में स्थानांतरित कर दिया गया है। सहकारिता विभाग द्वारा प्रस्तावित 13 समितियों की सूची को दरकिनार कर लिए गए इस निर्णय से किसानों में आक्रोश है और प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर मिलीभगत के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

​दागी सिंडिकेट को दोबारा मिला सरकारी उपार्जन केंद्र

​मझौली क्षेत्र में पिताश्री वेयरहाउस को उपार्जन केंद्र बनाए जाने के निर्णय ने प्रशासनिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। जानकारों का कहना है कि अमित पवार के नियंत्रण वाले इन वेयरहाउसों का पुराना इतिहास विवादित रहा है। सियाराम वेयरहाउस में 2023 में हुआ घोटाला अभी तक सुलझ नहीं पाया है और किसान भुगतान के लिए परेशान हैं। इसके बावजूद उसी प्रबंधन से जुड़े दूसरे वेयरहाउस को नई फसल की जिम्मेदारी सौंप दी गई है। विशेषज्ञों को आशंका है कि इस केंद्र का उपयोग पुरानी घटिया मूंग को नई उपज से बदलने के लिए एक सुरक्षित कॉरिडोर की तरह किया जा सकता है। क्षेत्र में कई अन्य साफ-सुथरे और खाली वेयरहाउस उपलब्ध होने के बावजूद एक विवादित ग्रुप को प्राथमिकता देना किसी गहरी सेटिंग की ओर इशारा कर रहा है।

​पाटन के किसानों को मिला दूर दराज केंद्र

​पाटन तहसील के किसानों के लिए प्रशासन का यह फैसला किसी सजा से कम नहीं है। भौगोलिक स्थिति को पूरी तरह नजरअंदाज कर पाटन का उपार्जन केंद्र उठाकर कटंगी स्थित रुद्रास वेयरहाउस में शिफ्ट कर दिया गया है, जबकि इसकी जिम्मेदारी बोरिया समिति को दी गई है। यह कदम सहकारिता विभाग के उस प्रस्ताव के भी विरुद्ध है जिसमें पाटन में ही दो केंद्र खोलने की अनुशंसा की गई थी। अन्य क्षेत्रों को प्राथमिकता देने के बावजूद पाटन जैसे कृषि प्रधान क्षेत्र को दूर केंद्र दिए जाने से छोटे किसानों को या तो अपनी उपज कम दाम पर बिचौलियों को बेचने को मजबूर होना पड़ेगा या फिर भारी परिवहन खर्च उठाना पड़ेगा। इस पूरे खेल में प्रशासनिक अधिकारियों की भूमिका संदेह के घेरे में है।

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