जबलपुर। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस शासकीय महाकोशल कॉलेज में गत दिवस भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध के अंतर्संबंधों पर केंद्रित एक विशेष व्याख्यान कार्यक्रम संपन्न हुआ। हिंदी विभाग द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में देश के प्रतिष्ठित शिक्षाविद् प्रो. उमेश कुमार सिंह ने मुख्य वक्ता के रूप में शिरकत की। उन्होंने प्राचीन भारतीय चिंतन की गहराई और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि शोध कार्यों के जरिए पुराने अनुभवों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक से समन्वित कर नई संभावनाओं के द्वार खोले जा सकते हैं।
प्राचीन विरासत और आधुनिक शोध का समन्वय
प्रो. उमेश कुमार सिंह ने अपने संबोधन में बताया कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का हिस्सा नहीं है बल्कि यह भविष्य की राह दिखाने में सक्षम है। उन्होंने वेद, उपनिषद, योग, आयुर्वेद और भारतीय दर्शन के वैज्ञानिक पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए इनकी व्यावहारिक उपयोगिता को महत्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार शिक्षा के क्षेत्र में शोधार्थियों को अपनी जड़ों से जुड़कर नवीन अनुसंधान की ओर बढ़ना चाहिए। इस दौरान प्राचार्य डॉ. अलकेश चतुर्वेदी ने अध्यक्षीय भाषण देते हुए कहा कि भारतीय परंपरा को समकालीन पद्धतियों के साथ एकीकृत करना आज की जरूरत है। इससे न केवल शिक्षा बल्कि अनुसंधान के क्षेत्र को भी एक बेहतर दिशा प्राप्त होगी।
युवाओं को अनुसंधान के प्रति प्रेरित करने का लक्ष्य
कार्यक्रम के संयोजक और हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. अरुण शुक्ल ने संगोष्ठी के उद्देश्यों पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि इस आयोजन का मुख्य लक्ष्य युवाओं को शोध की बारीकियों से परिचित कराना और भारतीय ज्ञान को विश्व पटल पर मजबूती से स्थापित करना है। डॉ. तृप्ति उकास ने कार्यक्रम के दौरान मंच का सफल संचालन किया। इस व्याख्यान के माध्यम से महाविद्यालय के शोधार्थियों और विद्यार्थियों को भारतीय ग्रंथों में छिपे वैज्ञानिक सत्यों को आधुनिक संदर्भ में समझने का अवसर मिला। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि शोध की गुणवत्ता तभी बढ़ेगी जब वह मौलिक चिंतन पर आधारित होगी।
अकादमिक स्टाफ और शोधार्थियों की सहभागिता
इस महत्वपूर्ण शैक्षणिक गतिविधि में महाविद्यालय के अनेक वरिष्ठ प्राध्यापक और विद्वान शामिल हुए। उपस्थिति दर्ज कराने वालों में डॉ. नीना उपाध्याय, डॉ. ज्योति जैन, डॉ. मनोज प्रियदर्शन, डॉ. ज्योति जुनगरे, डॉ. इंद्र कुमार बड़कडे, डॉ. मनोज विश्वकर्मा, डॉ. ज्ञानेश पाण्डेय, डॉ. रुकमणि अहिरवार, श्रीमती लल्लाबाई लोधी, डॉ. महेन्द्र कुशवाहा, डॉ. कमलेश मौर्य, डॉ. अनिल यादव और डॉ. सुदेश मेहलोरिया प्रमुख रहे। इनके साथ ही बड़ी संख्या में महाविद्यालय के अन्य शिक्षक और सक्रिय शोधार्थी भी मौजूद रहे,जिन्होंने विषय पर गहन मंथन किया।

