जबलपुर। पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के अंतर्गत बालाघाट क्षेत्र में एक बड़ा घोटाला सामने आया है। यहाँ तकनीकी मापदंडों को दरकिनार करते हुए एक निजी औद्योगिक इकाई का विद्युत भार बढ़ा दिया गया, जिससे सरकारी खजाने को लाखों रुपये की चपत लगी है। इस गंभीर चूक के प्रकाश में आने के बाद कंपनी प्रबंधन ने सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता सहित तीन आला अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया है। जांच में पाया गया कि बिजली की लाइनों की क्षमता जाँचे बिना और आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किए बगैर ही लोड वृद्धि की अनुमति दे दी गई।
तकनीकी मानकों और सुरक्षा नियमों की खुली अनदेखी
यह पूरा प्रकरण मेसर्स रमणीक पावर एंड एलाए प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित है। कंपनी ने 30 अक्टूबर 2025 को अपना विद्युत भार 10 हजार केव्हीए से बढ़ाकर 15 हजार केव्हीए करने का आवेदन दिया था। नियमानुसार किसी भी उच्च दाब कनेक्शन का भार बढ़ाने से पहले 33 केव्ही लाइन का विस्तार, तारों का सुदृढ़ीकरण और एस्टीमेट की स्वीकृति अनिवार्य होती है। तकनीकी विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया था कि मौजूदा बुनियादी ढांचे में बदलाव किए बिना अतिरिक्त लोड वहन करना संभव नहीं है। इसके बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों ने मात्र 13 दिनों के भीतर, यानी 12 नवंबर 2025 को बिना किसी भौतिक सुधार के लोड बढ़ाने की अनुमति प्रदान कर दी।
बिलिंग में देरी से 55 लाख से अधिक का नुकसान
वित्तीय अनियमितता का एक बड़ा पहलू बिलिंग प्रक्रिया से जुड़ा है। भार वृद्धि के बाद जिस संशोधित दर से वसूली की जानी थी, उसमें जानबूझकर दो माह का विलंब किया गया। केंद्रीय बिलिंग प्रकोष्ठ के अतिरिक्त मुख्य महाप्रबंधक पीके अग्रवाल पर आरोप है कि उन्होंने बिलिंग संयोजन भार की प्रक्रिया को समय पर पूरा नहीं किया। इस लापरवाही के चलते कंपनी को मिलने वाली 55 लाख 20 हजार रुपये की राशि समय पर प्राप्त नहीं हो सकी। इसके अलावा लोड बढ़ाने के लिए जो सुपरविजन शुल्क जमा होना था, उसे भी नजरअंदाज कर दिया गया, जो सीधे तौर पर सेवा नियमों का उल्लंघन है।
कारण बताओ नोटिस के बाद हड़कंप
प्रबंधन ने इस मामले में बालाघाट के तत्कालीन अधीक्षण यंत्री अमित कुमार और अतिरिक्त मुख्य महाप्रबंधक पीके अग्रवाल को दोषी माना है। उन्हें जारी नोटिस में स्पष्ट किया गया है कि उनकी कार्यशैली कर्तव्य के प्रति घोर लापरवाही और वित्तीय कदाचार की श्रेणी में आती है। इन दोनों अधिकारियों को अपना पक्ष रखने के लिए सात दिन का समय दिया गया है। विभाग ने माना है कि तकनीकी परीक्षण के बिना स्वीकृति देना न केवल राजस्व की हानि है, बल्कि विद्युत तंत्र की सुरक्षा के साथ भी खिलवाड़ है।
सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता पर कानूनी कार्रवाई होगी
मामले की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें तत्कालीन मुख्य अभियंता केएल वर्मा की भूमिका को भी संदिग्ध पाया गया है। चूंकि वर्मा अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं, इसलिए विभाग ने उनके खिलाफ कार्रवाई करने के लिए विधिक विशेषज्ञों से राय मांगी है। जांच इस बिंदु पर केंद्रित है कि सेवानिवृत्ति के पश्चात उनके पेंशन लाभों और अन्य देयकों पर किस तरह का अंकुश लगाया जा सकता है। इस हाईप्रोफाइल मामले में अब विभिन्न स्तरों से सिफारिशों का दौर भी शुरू हो गया है, लेकिन कंपनी प्रशासन ने पारदर्शी जांच और कड़ी दंडात्मक कार्रवाई के संकेत दिए हैं।
