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स्कूली किताबों की दुकानों पर 'नकली किल्लत' का ड्रामा, प्रशासन के हाथ लगे सबूत, सिंडिकेट पर एक्शन की तैयारी!



जबलपुर। शहर के स्कूलों में पुस्तक चयन और उनके वितरण को लेकर चल रही मनमानी के खिलाफ जिला प्रशासन ने मोर्चा खोल दिया है। शहर के कई निजी स्कूलों में सरकारी नियमों की अनदेखी करते हुए छात्रों को खास पब्लिशर्स की पुस्तकें खरीदने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव देखा जा रहा है जिससे अभिभावकों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ बढ़ रहा है।

​नियमों की अनदेखी, चुनिंदा प्रकाशकों पर भरोसा

​शहर के विभिन्न स्कूलों में रत्ना सागर प्राइवेट लिमिटेड, स्काई पब्लिकेशन, आवर्तन पब्लिकेशन और जूम पब्लिकेशन की किताबों को अनिवार्य रूप से लागू किया गया है। नियमानुसार स्कूल प्रबंधन को किताबों की सूची समय से पहले सार्वजनिक करनी चाहिए ताकि अभिभावक अपनी सुविधा के अनुसार उन्हें कहीं से भी खरीद सकें। हालांकि वर्तमान में अन्य विकल्पों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है जिससे बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा खत्म हो रही है। यह व्यवस्था सीधे तौर पर शासन के निर्देशों का उल्लंघन है और तकनीकी रूप से इसे पारदर्शिता के सिद्धांतों के विपरीत माना जा रहा है।

​सीमित दुकानों पर आपूर्ति,लुट रहे अभिभावक

​प्रकाशकों द्वारा अपनी मनमर्जी चलाते हुए किताबों की सप्लाई केवल कुछ विशेष दुकानों तक ही सीमित रखी जा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि सामान्य पुस्तक विक्रेताओं के पास संबंधित सामग्री उपलब्ध नहीं है जिससे कृत्रिम कमी के हालात बन गए हैं। कुछ मामलों में तो एक ही विषय के अलग-अलग संस्करण अनिवार्य कर दिए गए हैं। इस प्रक्रिया से न केवल किताबों की लागत बढ़ी है बल्कि छात्रों और अभिभावकों के बीच भ्रम की स्थिति भी उत्पन्न हुई है। प्रशासन का मानना है कि सीमित विक्रेताओं के माध्यम से बिक्री सुनिश्चित करना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है जिससे अभिभावकों की जेब पर असर पड़ रहा है।

​कलेक्टर का सख्त रुख और एफआईआर की तैयारी

​जबलपुर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए सख्त कार्रवाई के संकेत दिए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है कि जिन प्रकाशकों द्वारा गड़बड़ी की जा रही है उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की जा रही है। यदि भविष्य में भी ऐसी शिकायतें मिलती हैं तो और अधिक कड़ी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी। प्रशासन ने यह भी साफ कर दिया है कि समझाइश के बाद भी यदि सुधार नहीं होता है तो जिम्मेदार प्रकाशकों के साथ-साथ इसमें शामिल अन्य पक्षों पर भी प्रकरण दर्ज होंगे। यदि जांच में स्कूलों की मिलीभगत पाई जाती है तो उनके खिलाफ भी कठोर अनुशासनात्मक कदम उठाए जाएंगे।

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