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जबलपुर जिले में नरवाई जलाने पर लगा प्रतिबंध, कलेक्टर ने आदेश जारी किया

जबलपुर. जिला दण्डाधिकारी एवं कलेक्टर राघवेन्द्र सिंह ने जिले में नरवाई (पराली) जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। कृषि भूमि और पर्यावरण को होने वाले नुकसान को देखते हुये भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 की धारा 163 के तहत जारी यह सम्पूर्ण जिले में तत्काल प्रभाव से लागू हो गया है। 

जिला दंडाधिकारी ने प्रतिबंधात्मक आदेश में गेहूँ फसल की कटाई में प्रयुक्त किये जा रहे कम्बाइन्ड हार्वेस्टर के साथ भूसा तैयार करने के लिये स्ट्रा रीपर को रखना भी अनिवार्य किया है। आदेश में कहा गया है कि किसान गेहूँ की कटाई के बाद खड़ी नरवाई में सीधे हैप्पी सीडर या सुपर सीडर से बोनी कर सकते हैं। इससे मृदा में जैविक कार्बन की मात्रा में वृद्धि के साथ लागत में कमी आती है। इसके अलावा बेलर, स्लेसर एवं रैकर मशीन से नरवाई के बंडल बनवाकर इन बंडलों का फैक्ट्रियों में ईंधन (पैलेट), पैकेजिंग मटेरियल, पेपर उद्योग, बायो फर्टिलाइजर, कम्प्रेस बायो गैस बनाने में भी किया जा सकता है और अतिरिक्त कमाई की जा सकती है।

प्रतिबंधात्मक आदेश में बताया गया है कि गेहूँ की कटाई अधिकांशत: कम्बाइंड हार्वेस्टर द्वारा की जाती है और कटाई के बाद फसल की नरवाई में आग लगा दी जाती है। जबकि, कटाई के उपरांत बचे हुये गेहूँ के डंठलों (नरवाई) में आग न लगाकर इससे भूसा बनाया जा सकता है और भूसे का उपयोग पशु आहार के साथ ही अन्य उद्योग में किया जा सकता है।

भूसे की मांग अन्य जिलों और प्रदेश में भी रहती है। पर्याप्त मात्रा में भूसा उपलब्ध न होने के कारण पशु अन्य हानिकारक पदार्थ जैसे पॉलिथीन इत्यादि खाकर बीमार होते हैं और अनेक बार मृत्यु के कारण पशुधन की हानि भी होती है। किसानों को नरवाई का यही भूसा कुछ माह बाद  बढ़ी हुई दर पर क्रय करना पड़ता है। 

आदेश में उल्लेख किया गया है कि नरवाई एवं पैरा में आग लगाना कृषि के लिए नुकसानदायक होने के साथ ही पर्यावरण की दृष्टि से भी हानिकारक है। इसके कारण गंभीर स्वरूप की अग्नि दुर्घटना होने से संपत्ति की हानि भी होती है। बढ़ते जल संकट में बढोत्तरी का कारक होने के साथ ही इससे कानून-व्यवस्था के लिए विपरीत परिस्थितियां निर्मित होती हैं। इसके अलावा खेत की आग के अनियंत्रित होने पर जन-धन, संपत्ति, प्राकृतिक, वनस्पति और जीव-जन्तु नष्ट होने से व्यापक नुकसान भी होता है।

नरवाई जलाने से खेत की मिट्टी में प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु नष्ट होने के कारण खेत की उर्वरा शक्ति घट जाती है और उत्पादन प्रभावित होता है। जबकि, खेत में कचरा, भूसा, डंठल सडने के बाद भूमि को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाते हैं। इन्हें जलाकर नष्ट करना ऊर्जा नष्ट करने जैसा है। आग लगाने से हानिकारक गैसों का उत्सर्जन भी होता है। जिससे पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।  प्रतिबंधात्मक आदेश में कहा गया है कि इसका उल्लंघन करने पर भारतीय न्याय संहिता-2023 के प्रावधानों के तहत दण्डनीय कार्यवाही होगी।

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