जबलपुर। लद्दाख के प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के विरुद्ध लगाई गई राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) की कार्रवाई वापस लिए जाने के बाद कानूनी गलियारों में हलचल तेज हो गई है। वरिष्ठ अधिवक्ता और राज्यसभा सदस्य विवेक तन्खा ने इस पूरे घटनाक्रम पर अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया दी है। उनका मानना है कि केंद्र सरकार द्वारा रासुका को वापस लेना एक प्रकार से न्यायिक कसौटी पर अपनी विफलता को स्वीकार करना है। तन्खा ने स्पष्ट किया कि यदि इस मामले में देश की सर्वोच्च अदालत का अंतिम फैसला आ जाता, तो वह देश भर में इस कानून के तहत निरुद्ध हजारों अन्य लोगों के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करता। उनके अनुसार सरकार ने रासुका हटाकर स्वयं को सुप्रीम कोर्ट के संभावित कड़े न्यायिक परीक्षण से बचा लिया है।
न्यायिक समीक्षा से बचने का आरोप
वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने बताया कि सोनम वांगचुक के मामले में उनकी टीम की कानूनी तैयारी अत्यंत प्रभावी और मजबूत थी। उन्होंने तर्क दिया कि केंद्र सरकार को इस बात का आभास हो गया था कि उच्चतम न्यायालय में उनकी स्थिति कमजोर है। यदि अदालत इस पर सुनवाई कर अपना निर्णय सुनाती, तो भविष्य के लिए ऐसे मामलों में एक स्पष्ट कानूनी नजीर स्थापित हो जाती। इससे उन तमाम नागरिकों को बड़ी राहत प्राप्त होती जो प्रशासनिक त्रुटियों अथवा राजनीतिक कारणों से रासुका जैसी सख्त धाराओं का सामना कर रहे हैं। तन्खा ने जोर देकर कहा कि न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से दूध का दूध और पानी का पानी होना आवश्यक था, परंतु सरकार ने बीच में ही कदम पीछे खींचकर इस अवसर को समाप्त कर दिया।
गिरफ्तारी का घटनाक्रम:कब-क्या हुआ
इस प्रकरण की समयरेखा पर प्रकाश डालते हुए विवेक तन्खा ने बताया कि 26 सितंबर को जब सोनम वांगचुक को हिरासत में लिया गया था, तब उनकी पत्नी गीतांजलि ने सबसे पहले उनसे संपर्क कर सहायता मांगी थी। इसके बाद इस गंभीर विषय को देश के राष्ट्रपति के संज्ञान में लाया गया और कानूनी लड़ाई की रूपरेखा तैयार की गई। सुप्रीम कोर्ट में इस कार्रवाई को चुनौती देने के लिए विवेक तन्खा के साथ देश के अन्य दिग्गज अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने भी मोर्चा संभाला था। इन दोनों वरिष्ठ वकीलों ने अदालत के समक्ष सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया और समयसीमा में मौजूद गंभीर खामियों को प्रमुखता से उजागर किया था। तन्खा का दावा है कि यदि सरकार अपना आदेश वापस नहीं लेती, तो अदालत में उनकी जीत सुनिश्चित थी।
गृहमंत्री को लिखा गया पत्र
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए विवेक तन्खा ने स्वयं केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह को एक पत्र लिखकर अपना विरोध दर्ज कराया था। उस पत्र के माध्यम से उन्होंने गृहमंत्री को अवगत कराया था कि प्रशासन ने एक गलत और निर्दोष व्यक्ति पर हाथ डाला है। श्री तन्खा के अनुसार सोनम वांगचुक न केवल एक प्रखर राष्ट्रवादी हैं, बल्कि वे वैश्विक स्तर पर सम्मानित जलवायु परिवर्तन कार्यकर्ता भी हैं जो वर्षों से लद्दाख की सुरक्षा और वहां के पर्यावरण के संरक्षण हेतु कार्य कर रहे हैं। उन्होंने संतोष व्यक्त किया कि अंततः शासन के भीतर बैठे समझदार लोगों ने स्थिति की गंभीरता को समझा और सही परामर्श को स्वीकार किया। वर्तमान में रासुका हटने के बाद इसे वांगचुक की वैचारिक और कानूनी जीत के रूप में देखा जा रहा है।
