जबलपुर। संजय गांधी ताप विद्युत गृह बिरसिंहपुर में कोयला अनलोडिंग के दौरान सामने आए बड़े फर्जीवाड़े की जांच रिपोर्ट आखिर कहां गायब हो गई? यह सवाल अब पावर जनरेटिंग कंपनी (जेनको) के गलियारों में गूँज रहा है। घटना के तुरंत बाद जबलपुर मुख्यालय से जो टीम बिजली की गति से जांच करने बिरसिंहपुर पहुंची थी, वह अब पूरी तरह खामोश है। उस वक्त भ्रष्टाचार के विरुद्ध शून्य सहिष्णुता और नैतिकता की दुहाई देने वाले आला अधिकारी अब इस मामले पर फोन तक उठाना मुनासिब नहीं समझ रहे हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि करोड़ों के कोयले के खेल की जांच को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है? क्या रसूखदार ठेका कंपनी को बचाने के लिए फाइलें दबा दी गई हैं?
इत्तेफाक से खुली अनलोडिंग के खेल की पोल
इस पूरे घोटाले का पर्दाफाश किसी जांच से नहीं, बल्कि एक संयोगवश हुई रेल दुर्घटना से हुआ। 30 जनवरी को बिरसिंहपुर ताप विद्युत गृह से कोयला अनलोड करके खाली लौट रही एक मालगाड़ी अंबिकापुर के दरीटोला के पास पलट गई। कागजों पर यह ट्रेन पूरी तरह खाली दर्ज थी, लेकिन जैसे ही वैगन पलटे, उनमें से भारी मात्रा में कोयला बाहर बिखर गया। यह इस बात का सीधा प्रमाण था कि अनलोडिंग का काम देख रही राधा चेन्नई लिमिटेड नामक ठेका कंपनी ने कोयला पूरी तरह खाली नहीं किया था और वैगनों में कोयला छोड़कर उसे अवैध रूप से संयंत्र से बाहर भेजा जा रहा था।
-सीसीटीवी न होना लापरवाही या साजिश
हैरानी की बात यह है कि 1320 मेगावाट क्षमता वाले इस विशाल संयंत्र में, जहां हर महीने करोड़ों रुपये अनलोडिंग पर खर्च होते हैं, वहां निगरानी के लिए सीसीटीवी कैमरों का अभाव है। जांच में सामने आया कि अनलोडिंग साइट पर एक भी चालू कैमरा नहीं मिला। स्थानीय सूत्रों का कहना है कि पहले यहां कैमरे लगाए गए थे, लेकिन उन्हें जानबूझकर तकनीकी खराबी के नाम पर बंद करा दिया गया ताकि कोयले की हेराफेरी को गुप्त रखा जा सके। वर्तमान में पूरी निगरानी केवल वे-ब्रिज (तौल कांटे) के भरोसे है, जिसका संचालन भी उन्हीं अधिकारियों के हाथ में है जिनकी भूमिका इस पूरे मामले में संदेहास्पद बनी हुई है।
-अफसरों की दलील और आंकड़ों का विरोधाभास
प्रबंधन ने प्रारंभिक जांच में माना कि एक वैगन में करीब 20 टन कोयला छूटा था, जबकि दुर्घटना स्थल पर केवल 10 टन ही मिला। अफसरों का तर्क है कि बाकी कोयला स्थानीय लोगों ने उठा लिया होगा या गीला होने के कारण वैगन में चिपका रह गया होगा। सवाल यह उठता है कि क्या 20 टन कोयला मानवीय चूक से छूट सकता है। कंपनी ने ठेका कंपनी पर 2 लाख रुपये की मामूली पेनल्टी लगाकर खानापूर्ति करने की कोशिश की है, जबकि मांग ठेका निरस्त करने और संलिप्त अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने की थी।
-मौन हुए जिम्मेदार, उठ रहे गंभीर सवाल
जबलपुर मुख्यालय की विशेष टीम ने शुरुआती दौर में कड़ी कार्रवाई के संकेत दिए थे। पिछले छह माह के रिकॉर्ड खंगालने और मजदूरों के बयान लेने का दावा भी किया गया था। लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, अफसरों के तेवर ढीले पड़ गए। आज स्थिति यह है कि जांच की प्रगति पूछने पर अधिकारी कन्नी काट रहे हैं। यह चुप्पी इस आशंका को पुख्ता करती है कि कोयला चोरी का यह सिंडिकेट बहुत ऊपर तक जुड़ा हुआ है, जिसे अब लीपापोती कर दबाने का प्रयास किया जा रहा है।
