जबलपुर। मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने झूठी घोषणा के आधार पर शस्त्र लाइसेंस का नवीनीकरण (रिन्यूअल) कराने वाले आरोपी फैज़ान खान की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की एकल पीठ ने सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति तथ्यों को छिपाकर या गलत जानकारी देकर लाइसेंस प्राप्त करता है, तो वह किसी भी कानूनी राहत का पात्र नहीं है। यह पूरा मामला भोपाल के हनुमानगंज थाने से जुड़ा है, जहाँ आरोपी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता और आर्म्स एक्ट की विभिन्न गंभीर धाराओं के तहत मामला दर्ज है।
पुराने आपराधिक रिकॉर्ड को छिपाने का है आरोप
मामले के अनुसार, आरोपी फैज़ान खान ने अपने आर्म्स लाइसेंस के नवीनीकरण के दौरान एक हलफनामा जमा किया था। इसमें उसने यह घोषणा की थी कि उसके विरुद्ध कोई भी आपराधिक मामला न तो दर्ज है और न ही कोर्ट में लंबित है। इसी जानकारी को सच मानकर प्रशासन ने उसका लाइसेंस रिन्यू कर दिया। हालांकि, बाद में पुलिस रिकॉर्ड से खुलासा हुआ कि वर्ष 2019 में हनुमानगंज थाने में उसके खिलाफ आईपीसी की कई धाराओं के तहत केस दर्ज हुआ था, जिसमें उसे कोर्ट ट्रायल का सामना भी करना पड़ा था।
इसे धोखाधड़ी माना जायेगा - हाईकोर्ट
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी को 7 मार्च 2019 को संबंधित मामले में बरी कर दिया गया था क्योंकि गवाह अपने बयानों से मुकर गए थे। उन्होंने यह भी कहा कि विवादित घोषणा मुख्य हलफनामे का हिस्सा न होकर उसके पीछे लिखी एक टिप्पणी थी। इस पर कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि बरी होने का मतलब यह नहीं है कि मामला कभी दर्ज ही नहीं हुआ था। जस्टिस अहलूवालिया ने टिप्पणी की कि चूंकि आरोपी ने स्पष्ट रूप से 'कोई मामला दर्ज नहीं' होने की घोषणा की थी, जो कि तथ्यात्मक रूप से गलत है, इसलिए इसे धोखाधड़ी माना जाएगा।
अग्रिम जमानत देने से अदालत का इनकार
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी ने जानबूझकर अपने आपराधिक अतीत को छिपाया और प्रशासन को गुमराह कर हथियार का लाइसेंस हासिल किया। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह धोखाधड़ी और गलत तथ्य प्रस्तुत करने का मामला है। इन्हीं आधारों पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 482 के तहत दायर अग्रिम जमानत अर्जी को खारिज कर दिया गया। कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि सुरक्षा और हथियारों से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और ईमानदारी अनिवार्य है।
