जबलपुर। सुप्रीम कोर्ट ने मध्यप्रदेश में ओबीसी आरक्षण से जुड़े सभी विवादित मामलों को वापस मध्यप्रदेश हाईकोर्ट भेज दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हर राज्य की सामाजिक परिस्थितियां अलग होती हैं, इसलिए छत्तीसगढ़ के फॉर्मूले को सीधे तौर पर मध्यप्रदेश पर थोपना सही नहीं है। शीर्ष कोर्ट ने हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को तीन माह के भीतर विशेष बेंच गठित कर इन मामलों को प्राथमिकता से निपटाने के निर्देश दिए हैं।
27% आरक्षण पर कोई कानूनी रोक नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में बड़ी स्पष्टता के साथ कहा कि वर्तमान में 27% ओबीसी आरक्षण के कानून पर कोई रोक नहीं है। कोर्ट ने छत्तीसगढ़ के 1 मई 2023 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार चाहे, तो याचिकाओं के अंतिम निर्णय के अधीन रहते हुए 27% आरक्षण लागू कर सकती है। कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के पुराने अंतरिम आदेश केवल 2019 के अध्यादेश तक सीमित थे, जबकि बाद में सरकार ने अधिनियम में संशोधन कर कानूनी प्रावधान कर दिया था।
छत्तीसगढ़ का उदाहरण मध्यप्रदेश के लिए बाध्यकारी नहीं
सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की गई कि आरक्षण एक नीतिगत विषय है जो राज्य की विशिष्ट सामाजिक संरचना पर निर्भर करता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि छत्तीसगढ़ की जनसांख्यिकीय स्थिति मध्यप्रदेश के लिए मार्गदर्शक नहीं हो सकती। मध्यप्रदेश को अपनी सकारात्मक कार्रवाई की वैधता खुद तय करनी होगी। बिना हाईकोर्ट के अंतिम फैसले के, सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट द्वारा इसका परीक्षण करना उचित नहीं है। शीर्ष अदालत ने अब गेंद मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के पाले में डाल दी है। हाईकोर्ट को निर्देश दिए गए हैं कि वह राज्य सरकार द्वारा दायर अंतरिम आवेदनों पर विचार करे और एक विशेष बेंच के माध्यम से 90 दिनों के भीतर सभी संबंधित मामलों का निराकरण करे।
