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खतरे में नर्मदा का अस्तित्व: 36.7% पेयजल सैंपल फेल, हाईकोर्ट ने पीएच लेवल और सीवेज पर जताई चिंता


जबलपुर
। मध्य प्रदेश की जीवन रेखा मानी जाने वाली नर्मदा नदी में बढ़ते प्रदूषण को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने राज्य सरकार के विभिन्न विभागों, नगर निगम जबलपुर और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है। याचिका में दावा किया गया है कि जबलपुर में प्रतिदिन 98 करोड़ लीटर अनुपचारित सीवेज सीधे नर्मदा में बहाया जा रहा है।

​नदी के पानी में मिला खतरनाक बैक्टीरिया और हाई पीएच

​ अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि शोध के अनुसार नर्मदा के पानी में 'फीटल कॉलीफॉर्म' जैसे हानिकारक बैक्टीरिया की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है, जो मानव और पशु मल-मूत्र के जरिए पानी में फैलते हैं। इसके अलावा, जबलपुर के पास नदी के पानी का पीएच  स्तर 8.5 की सुरक्षित सीमा को पार कर गया है, जिससे पानी क्षारीय हो गया है। यह स्थिति न केवल जलीय जीवन बल्कि इस पानी का उपयोग करने वाली एक बड़ी आबादी के स्वास्थ्य के लिए भी गंभीर खतरा है।

​मध्य प्रदेश में जल जनित बीमारियों का बढ़ा खतरा

​सुनवाई के दौरान जल जीवन मिशन की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में 36.7% पेयजल के नमूने असुरक्षित पाए गए हैं। हाल ही में इंदौर में दूषित पानी के कारण डायरिया फैलने से हुई मौतों का उदाहरण देते हुए कोर्ट को बताया गया कि यदि सीवेज और औद्योगिक अपशिष्ट का उपचार नहीं किया गया, तो स्थिति और भी भयावह हो सकती है।

​प्रदूषण रोकथाम और बहाली की मांग

​याचिकाकर्ता विनीता आहूजा की ओर से मांग की गई है कि नर्मदा नदी की पारिस्थितिक अखंडता को बहाल करने के लिए तत्काल ठोस कदम उठाए जाएं। याचिका में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट  की कार्यक्षमता बढ़ाने और नदी में गिर रहे कचरे को रोकने के लिए सख्त निर्देश देने का आग्रह किया गया है। कोर्ट ने अब इस मामले को पहले से लंबित अन्य जनहित याचिकाओं के साथ जोड़कर आगे की सुनवाई का निर्णय लिया है।

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