जबलपुर। प्रकृति जब करवट लेती है, तो सबसे ज्यादा सिहरन उस किसान के मन में होती है जिसने पसीने से अपनी फसल सींची होती है। जबलपुर जिले में मौसम का मिजाज एक बार फिर बदल गया है। आसमान में उमड़ते बादलों ने उन हजारों किसानों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, जिनकी मेहनत की कमाई यानी हजारों क्विंटल धान, आज सरकारी खरीद केंद्रों के बाहर खुले आसमान के नीचे पड़ी है। विडंबना देखिए, जिस अनाज को सहेजकर गोदामों में होना चाहिए था, वह आज मिट्टी और नमी के हवाले है। कई केंद्रों पर धान की तुलाई तो हो चुकी है, लेकिन परिवहन और भंडारण की सुस्त रफ्तार ने उसे असुरक्षित छोड़ दिया है। अगर बारिश की एक बूंद भी इन ढेरों पर गिरी, तो करोड़ों रुपये की उपज देखते ही देखते बर्बाद हो जाएगी। यह सिर्फ सरकारी आंकड़ों का नुकसान नहीं होगा, बल्कि एक किसान के साल भर के सपनों की बर्बादी होगी।
अभी हरा है पिछले साल का जख्म
पिछले साल का जख्म अभी भरा नहीं है। बीते साल भी दिसंबर की बेवक्त बारिश ने करोड़ों की धान गीली कर दी थी, जिससे शासन और किसान दोनों को भारी चोट पहुंची थी। बावजूद इसके, प्रशासन की नींद नहीं टूटी। किसान डरी हुई आंखों से कभी आसमान को देखते हैं तो कभी अपनी अनतुली फसल को। यदि समय रहते इस धान को तिरपाल से ढका नहीं गया या गोदामों तक नहीं पहुंचाया गया, तो इस बार भी अन्नदाता की मेहनत पानी में मिल जाएगी।
