हाई कोर्ट ने आर्थिक आवश्यकता न होने का दिया आधार,आठ साल पुराने मामले में कोर्ट ने याचिका खारिज की
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि आर्थिक जरूरत सिद्ध न हो और परिवार याचिकाकर्ता पर निर्भर न हो, तो शादीशुदा पुत्री अनुकंपा नियुक्ति की हकदार नहीं हो सकती। न्यायमूर्ति दीपक खोत की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए छिंदवाड़ा निवासी अनु पाल की याचिका को निरस्त कर दिया।याचिकाकर्ता ने अपनी मां मूला देवी, कर्मचारी वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL), की मृत्यु (7 नवंबर 2017) के बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। विभाग ने आवेदन इस आधार पर खारिज किया कि याचिकाकर्ता शादीशुदा है, और उसका पति WCL में कार्यरत है। साथ ही, मृतक कर्मचारी की अन्य दो बेटियों ने भी प्राधिकरण के समक्ष बयान दिया कि याचिकाकर्ता को अनुकंपा नियुक्ति नहीं दी जानी चाहिए। कोर्ट ने अपने निर्णय में कहा कि महिला कर्मचारी की मृत्यु को आठ वर्ष बीत चुके हैं। याचिकाकर्ता के परिवार को आर्थिक सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है, और न ही ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत किया गया जिससे यह सिद्ध हो सके कि मृतक के परिवार का कोई सदस्य याचिकाकर्ता पर निर्भर है। इसलिए अनुकंपा नियुक्ति पर दयापूर्वक विचार किए जाने का कोई आधार नहीं बनता।
-कोर्ट में क्या पाया गया
- याचिकाकर्ता शादीशुदा और पति डब्ल्यूसीएल में कार्यरत
- आर्थिक संकट का कोई साक्ष्य नहीं
- मृतक कर्मचारी की अन्य बेटियों ने भी विरोध में बयान दिया
- परिवार का कोई सदस्य याचिकाकर्ता पर निर्भर नहीं
- मृत्यु को आठ वर्ष बीत चुके हैं, इसलिए तात्कालिक सहायता की आवश्यकता सिद्ध नहीं
-कोर्ट की मुख्य टिप्पणियाँ
- आर्थिक आवश्यकता न होने पर अनुकंपा नियुक्ति संभव नहीं
- शादीशुदा पुत्री को प्राथमिकता का कानूनी आधार नहीं
- याचिका में प्रस्तुत दस्तावेज पात्रता सिद्ध नहीं करते
- परिस्थितियों में दया के आधार पर नियुक्ति उचित नहीं
- याचिका पूरी तरह निरस्त
