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कोयले पर टैक्स छूट नहीं, उपभोक्ताओं की जेब पर डाका,आक्रोश



जबलपुर। जीएसटी कौंसिल की 8 अक्टूबर की बैठक में विद्युत उत्पादक कोयले पर कर दर न घटाए जाने के फैसले से उपभोक्ताओं में गहरा असंतोष फैल गया है। इस निर्णय के खिलाफ नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के प्रांतीय अध्यक्ष डॉ. पीजी नाजपांडे, रजत भार्गव, टीके रायघटक, एड. वेदप्रकाश अधौलिया, सुभाष चन्द्रा, सुशीला कनौजिया, संतोष श्रीवास्तव, मनीष शर्मा, पीएस राजपूत, अशोक यादव, श्याम सोलंकी, केसी सोनी, घनश्याम सोनकर, एड. ब्रजेश साहू, प्रफुल्ल सक्सेना, वीएन कमलाकर, दिलीप कुण्डे और राममिलन शर्मा ने कड़ा विरोध जताया। संगठनों की उम्मीद थी कि पहले 5 प्रतिशत से बढ़ाकर 18 प्रतिशत किया गया टैक्स घटाकर फिर 5 प्रतिशत होगा, मगर राहत नहीं मिली। इस फैसले की दो प्रमुख बिंदुओं पर समीक्षा की मांग उठाई गई है।

​उत्पादन लागत घटने का भरोसा साबित हुआ खोखला।

​मंच के पदाधिकारियों ने पहले बिंदु को स्पष्ट करते हुए बताया कि 11 सितम्बर 2025 को संपन्न 26वीं बैठक के अवसर पर ईंधन कोयले पर 18 प्रतिशत टैक्स अधिरोपित किया गया था। इस नए कर ढांचे के साथ ही 400 रुपए प्रति टन की दर से लिया जाने वाला क्षतिपूर्ति उपकर समाप्त कर दिया गया था। उस दौरान संबंधित केंद्रीय मंत्रालय ने सार्वजनिक सूचना जारी करके यह भरोसा दिलाया था कि इस नीतिगत बदलाव के बाद बिजली उत्पादन की समग्र लागत में प्रति यूनिट 17 से 18 पैसे की सीधी राहत मिलेगी। इसके विपरीत वित्तीय सत्र 2025-26 का यथार्थ बेहद निराशाजनक रहा। उत्पादन व्यय कम होने के स्थान पर ऊर्जा प्रभार के टैरिफ में व्यापक उछाल दर्ज हुआ, जिससे उपभोक्ताओं पर आर्थिक संकट और अधिक गहरा गया।

​लगातार बढ़ते अधिभार ने घरेलू बजट बिगाड़ दिया।

​मंच ने दूसरे बिंदु की पड़ताल करते हुए दर्शाया कि बिजली की अंतिम दरों के आगणन में कोयले की कुल खरीद राशि को भी अभिन्न रूप से जोड़ा जाता है। इसी गणितीय समीकरण के चलते ईंधन सरचार्ज के आंकड़ों में अनपेक्षित रूप से भारी उछाल दर्ज हुआ। वर्ष 2026 के आरंभ यानी जनवरी माह में जहां यह सरचार्ज 1.58 प्रतिशत निर्धारित था, वहीं सितंबर 2026 आते-आते यह बढ़कर 5.06 प्रतिशत के उच्च स्तर को छू गया। इस अल्पकालिक अवधि में ही अधिभार के अंतर्गत 3.46 प्रतिशत की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। उपस्थित सदस्यों ने स्पष्ट रूप से चेताया कि यदि शासन स्तर पर दोनों आधारों का संज्ञान लेकर शीघ्र पुनर्विचार नहीं किया गया, तो घरेलू और व्यावसायिक उपभोक्ताओं पर यह बोझ असहनीय हो जाएगा।

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