जबलपुर। गरीबों के निवाले पर डाका डालने वाले तत्कालीन जिम्मेदार अधिकारियों की मुश्किलें अब बढ़ सकती हैं। गरीबों के हिस्से के 2.20 करोड़ रुपए मूल्य के सरकारी खाद्यान्न घोटाले में तत्कालीन जिला आपूर्ति नियंत्रक नुजहत बकाई बानो, कनिष्ठ आपूर्ति अधिकारी भावना तिवारी और सुचिता दुबे समेत 33 लोगों पर 5 सितंबर 2025 को एफआईआर दर्ज की गई थी। इसके बावजूद विभागीय सक्रियता पर सवाल खड़े करते हुए अधिवक्ता विनोद सिसोदिया ने शिकायत दर्ज कराई थी। अब संयुक्त आयुक्त (विकास) जबलपुर संभाग ने कलेक्टर को पत्र लिखकर शिकायत के बिंदुओं की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई के निर्देश जारी किए हैं। एफआईआर के बाद भी अफसरों की कार्यशैली और प्रशासनिक जवाबदेही पर उठे इस मामले ने तूल पकड़ लिया है।
अवैध खेल से खाली हुए सरकारी अन्न भंडार
घोटाले की विभागीय पड़ताल में शहर की 11 उचित मूल्य राशन दुकानों के भौतिक स्टॉक में भारी अंतर उजागर हुआ था। जांच दल को दुकानों में 391.780 मीट्रिक टन गेहूं, 338.789 मीट्रिक टन चावल, 3.027 मीट्रिक टन नमक और 0.970 मीट्रिक टन शक्कर की सीधी कमी मिली थी। इन गायब जिंसों का कुल सरकारी मूल्यांकन 2 करोड़ 20 लाख 12 हजार 460 रुपए आंका गया था। जांच में यह सनसनीखेज तथ्य सामने आया कि वर्ष 2022 के दौरान एईपीडीएस पोर्टल पर यूजर आईडी और आईपी एड्रेस का दुरुपयोग करते हुए डिजिटल स्टॉक घटाया गया था। इसी डिजिटल हेरफेर के जरिए सरकारी खाद्यान्न का बड़े पैमाने पर गबन अंजाम दिया गया।
एफआईआर के बाद भी लटकी विभागीय जांच प्रक्रिया
सरकारी रिकॉर्ड, तकनीकी छेड़छाड़ और मैदानी सत्यापन में गबन प्रमाणित होने तथा पुलिस मुकदमा दर्ज होने के बावजूद प्रभावी प्रशासनिक फैसले नहीं हो सके। गंभीर आर्थिक अनियमितता सामने आने के बाद भी संबंधितों पर ठोस विभागीय प्रहार के बजाय उन्हें पुनः पदस्थ करने के आरोप लगे हैं। सालों तक लंबित रहने वाली विभागीय जांचों की सार्थकता पर आम जनता सवाल उठा रही है। इस पूरे घटनाक्रम पर कलेक्टर राघवेंद्र सिंह का कहना है कि संबंधित पत्र प्राप्त हुआ है। जिला आपूर्ति नियंत्रक को पूर्व में निलंबित किया जा चुका है और अन्य संबंधितों के खिलाफ विभागीय जांच की प्रक्रिया अभी गतिमान है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर कितना कड़ा कदम उठाता है।
