जबलपुर। जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशुचिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय के वन्यजीव स्वास्थ्य केंद्र में नौरादेही अभयारण्य से लाई गई बीमार मादा बाघ का उपचार सफलतापूर्वक पूरा कर लिया गया है। करीब डेढ़ माह पूर्व अत्यंत नाजुक दशा में दाखिल इस वन्यप्राणी को चिकित्सकों की टीम ने गहन निगरानी व चिकित्सीय प्रबंधों के दम पर पूरी तरह स्वस्थ कर दिया है। अब यह मादा शिकारी अपने प्राकृतिक आवास में स्वतंत्र विचरण के सर्वथा योग्य बन चुकी है, लेकिन प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) कार्यालय से विधिवत अनुमति आदेश जारी न होने के कारण इसकी रवानगी अधर में लटकी हुई है। केंद्र निदेशक डॉ. आरके शर्मा के अनुसार मुख्यालय को लिखित रिपोर्ट भेजकर तत्काल मार्गदर्शन मांगा गया है, ताकि पिंजरे में लंबी कैद के कारण उत्पन्न होने वाले गंभीर जैविक जोखिमों से इसे सुरक्षित रखा जा सके।
कैद में लंबा ठहराव संक्रमण का खतरा बढ़ाएगा
विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी स्वस्थ वन्यप्राणी को उपचार समाप्ति के बाद अधिक समय तक बाड़े या पिंजरे में रखना उसके व्यवहार और रोग प्रतिरोधक क्षमता दोनों के लिए घातक साबित हो सकता है। वातावरण में मौजूद विभिन्न जीवाणु एवं कृत्रिम परिस्थितियां स्वस्थ हो चुके जीव में नए संक्रमण को जन्म दे सकती हैं। अस्पताल परिसर में निरंतर रहने से वन्यप्राणियों की प्राकृतिक आदतें, शिकार करने की सहज प्रवृत्तियां और मानवीय गंध से दूरी बनाए रखने का मूल स्वभाव भी प्रभावित होता है। वन्यजीव चिकित्सकों का पूरा दल लगातार इस बात को लेकर सतर्क है कि पिंजरे का संकुचित दायरा बाघिन के मानसिक व शारीरिक तनाव को न बढ़ा दे। प्रशासनिक तंत्र की औपचारिक अनुमति में हो रहा यह अनावश्यक विलंब न केवल पूर्व में की गई समस्त चिकित्सा मेहनत पर पानी फेर सकता है, बल्कि स्वस्थ वन्यजीव के जीवन को अकारण दोबारा संकट में धकेल रहा है।
सतत चिकित्सकीय सेवा के बाद अब विदाई की आस
पिछले 45 दिनों के दौरान संस्थान के वन्यजीव चिकित्सकों, सहायक कर्मियों और तकनीकी कर्मचारियों ने दिन-रात एक करके इस मादा बाघ की देखरेख की थी। शुरुआती दौर में जब इसे जंगल से रेस्क्यू कर केंद्र लाया गया था, तब इसकी हालत बेहद चिंताजनक थी और जीवित रहने की संभावनाओं पर भी संशय बना हुआ था। चिकित्सा दल ने घावों की सटीक ड्रेसिंग, दवाइयों के संतुलित डोज, पौष्टिक आहार और अनुकूल तापमान नियंत्रण के जरिए इसे नया जीवन प्रदान किया। रोजाना के खान-पान, रक्त जांच और शारीरिक गतिविधियों पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखी गई, जिसके सकारात्मक परिणाम स्वरूप यह पूरी तरह निरोग हो सकी। अपनी कठिन तपस्या को सफल देख अब पूरा चिकित्सा अमला चाहता है कि मरीज अपनी मूल दुनिया यानी खुले जंगल में सम्मानपूर्वक विदा हो जाए। भोपाल मुख्यालय स्तर पर फाइल का तेजी से निस्तारण ही इस निरपराध वन्यप्राणी को जल्द से जल्द आजादी दिला सकता है।
