जबलपुर। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की सेंट्रल जोन बेंच ने मध्य प्रदेश राज्य वेटलैंड अथॉरिटी को सख्त निर्देश दिए हैं कि प्रदेश के सभी जिला कलेक्टर और नगर निगम आयुक्त अपने-अपने क्षेत्रों में मौजूद तालाबों का फुल टैंक लेवल 15 दिन में तय करें। यह अहम फैसला अशोकनगर के तुलसी सरोवर पर फैले अतिक्रमण को लेकर जारी हुआ है। अधिकरण ने जलस्रोतों के 50 मीटर दायरे में बने अवैध निर्माण तुरंत हटाने और गंदा सीवेज व कचरा पानी में मिलने से रोकने का फरमान सुनाया है। नगरीय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव को उन दोषी अफसरों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का जिम्मा दिया गया है, जिन्होंने सार्वजनिक वेटलैंड पर कब्जे होने दिए। राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम लगाने का निर्देश मिला है।
जलसंरक्षण के लिए कड़े नियम लागू किए गए
मध्य प्रदेश में कुल 13565 चिन्हित वेटलैंड मौजूद हैं। अधिकरण ने संबंधित सरकारी विभागों को स्पष्ट आदेश दिया है कि आगामी 6 महीने की तय अवधि में इन सभी जलाशयों की ऑन-साइट सीमा मुनारों के जरिए स्थाई तौर पर चिन्हित की जाए। तुलसी सरोवर प्रकरण में याचिकाकर्ता ने पानी के प्राकृतिक बहाव को रोकने, कंक्रीट की दीवार खड़ी करने और मिट्टी का भराव डालकर बनावटी द्वीप तैयार करने का संगीन आरोप लगाया था। जांच समिति की पड़ताल में तालाब की अधिकृत सीमा और 50 मीटर के दायरे में 22 दुकानें, एक धर्मशाला, एक सार्वजनिक शौचालय और एक मंदिर बना हुआ पाया गया। इसके अलावा जलाशय के एफटीएल प्रभाव क्षेत्र में 65 मकान भी चिन्हित किए गए। इससे पहले नगर पालिका की 3 दुकानों को अतिक्रमण मानते हुए जमींदोज किया जा चुका है।
प्रदूषण फैलाने पर लगेगा पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति जुर्माना
जिला प्रशासन द्वारा उक्त जलस्रोत को केवल सिंचाई जलाशय बताकर भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वेटलैंड सूची से बाहर करने का प्रयास किया गया था। एनजीटी ने इस दलील को पूरी तरह खारिज करते हुए साफ किया कि सामान्य पत्राचार के आधार पर किसी भी चिन्हित वेटलैंड की कानूनी स्थिति नहीं बदली जा सकती। पानी की शुद्धता बनाए रखने के लिए राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को ऑनलाइन कंटीन्यूअस वाटर क्वालिटी मॉनिटरिंग सिस्टम तुरंत स्थापित करना होगा। यदि किसी भी स्रोत से उपचारित किए बिना गंदा सीवेज सीधे जलधारा में छोड़ा गया, तो संबंधित निकायों से भारी पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि वसूली जाएगी।
