हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए शिक्षा, जेल विभाग और बार काउंसिल से मांगी रिपोर्ट
जबलपुर। एक शासकीय स्कूल में कार्यरत शिक्षक द्वारा खुद को अधिवक्ता बताकर जेल में बंद कैदियों से 300 से अधिक वकालतनामे हासिल करने के गंभीर मामले पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने कड़ा रुख अख्तियार किया है। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति अवनींद्र कुमार सिंह की डिवीजन बेंच ने इस पूरे फर्जीवाड़े को न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ मानते हुए स्कूल शिक्षा विभाग, जेल प्रशासन और स्टेट बार काउंसिल को 30 दिनों के भीतर संयुक्त जांच पूरी कर विस्तृत रिपोर्ट अदालत में प्रस्तुत करने का कड़ा निर्देश जारी किया है। हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई के दौरान जबलपुर केंद्रीय जेल के अधीक्षक अखिलेश सिंह तोमर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। उन्होंने पीठ के समक्ष यह चौंकाने वाला तथ्य उजागर किया कि नीरज कुमार साकेत रीवा जिले के सिरमौर अंतर्गत शासकीय पूर्व माध्यमिक शाला बरेला में अतिथि शिक्षक के पद पर अपनी सेवाएं दे रहा है। यह प्रशासनिक खुलासा उस समय हुआ जब अधिवक्ता रामप्रकाश यादव द्वारा उच्च न्यायालय में पेश किए गए एक शपथ पत्र की जांच की जा रही थी। उस शपथ पत्र में नीरज कुमार साकेत को बाकायदा पंजीकृत अधिवक्ता दर्शाया गया था।
जेल अधीक्षक ने अपने बयान में क्या कहा
मामले की सुनवाई के दौरान अधिवक्ता सिद्धार्थ दत्त ने अदालत को बताया कि नीरज कुमार साकेत ने स्वयं को वकील के रूप में प्रस्तुत करके अलग-अलग जेलों के अधिकारियों से संपर्क साधा और अधिवक्ता रामप्रकाश यादव के नाम पर बंदियों के वकालतनामे प्राप्त किए। जेल अधीक्षक अखिलेश तोमर ने अपने बयान में पुष्टि की कि रीवा केंद्रीय जेल में निरुद्ध कैदियों से अधिवक्ता रामप्रकाश यादव के पक्ष में 300 से अधिक वकालतनामे इसी तरह नियम विरुद्ध तरीके से हासिल किए गए थे। एक शासकीय पद पर पदस्थ शिक्षक द्वारा जेलों के भीतर जाकर अनधिकृत तौर पर वकालतनामे जुटाने और वकालत की फर्जी पहचान इस्तेमाल करने की बात सामने आते ही उच्च न्यायालय ने गहरी नाराजगी जताई। अदालत ने कहा कि यह कृत्य विधिक आचार संहिता और शासकीय सेवा नियमों का सीधा उल्लंघन है। खंडपीठ ने तीनों संबंधित विभागों को निर्देशित किया है कि वे एक माह की तय समयसीमा में जांच पूरी कर अदालत को अवगत कराएं कि यह फर्जीवाड़ा किस स्तर पर और किन अधिकारियों की मिलीभगत से संचालित हो रहा था।
