ज्ञापन के माध्यम से प्रशासन का ध्यान ठेका कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन, ईपीएफ, ईएसआईसी, बोनस और समय पर मानदेय न मिलने जैसी समस्याओं की ओर खींचा गया। संघ ने आरोप लगाया कि ठेका एजेंसियां कर्मचारियों को समय पर वेतन नहीं दे रही हैं। कई महीनों का मानदेय रुका हुआ है। कर्मचारियों को तय दरों से कम पैसे दिए जा रहे हैं। साथ ही, बिना इजाजत कटौती की जा रही है और सरकारी छुट्टियों में भी उनसे बिना अतिरिक्त भुगतान के काम लिया जा रहा है। पारदर्शिता न होने के कारण कर्मचारियों को वेतन पर्ची, पहचान पत्र या नियुक्ति पत्र भी नहीं मिलते, जिससे उनके कानूनी अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। कर्मचारी संघ ने यह भी बताया कि कई विभागों में कर्मचारियों से कुशल या उच्च-कुशल स्तर का काम लिया जाता है। लेकिन कागजों में उन्हें 'अकुशल' दिखाकर कम वेतन दिया जाता है। इसके अलावा, सालों से ईमानदारी से काम कर रहे पुराने कर्मचारियों को बिना किसी वजह, सूचना या कानूनी प्रक्रिया के अचानक नौकरी से निकाल दिया जा रहा है। इससे सैकड़ों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया है। कर्मचारी प्रतिनिधियों का कहना है कि यह मुद्दा केवल आऊटसोर्स कर्मियों के हित तक सीमित नहीं है, बल्कि यह श्रम कानूनों के पालन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण विषय है। संघ के अनुसार यदि शासकीय विभागों की निगरानी व्यवस्था दुरुस्त कर आऊटसोर्स कर्मियों के वैधानिक अधिकारों और न्यूनतम वेतन की गारंटी नहीं दी गई, तो कर्मचारी अपने अधिकारों के लिए आंदोलन को और तेज़ करने के लिए विवश होंगे।