समुचित प्रबंधन प्रणाली लागू करना वक्त की जरूरत,किसानों की मांग अब तक अनसुनी
जबलपुर। जिले में अमरूद, नींबू, लौकी, फूलगोभी और बंदगोभी की बंपर पैदावार मिलने के बाद भी उत्पादकों को अपेक्षित वित्तीय लाभ नहीं मिल पा रहा है। सुरक्षा और कोल्ड चेन नेटवर्क के अभाव में खेतों से मंडी तक पहुंचते-पहुंचते कुल उपज का एक चौथाई भाग पूरी तरह नष्ट हो जाता है। इस गंभीर समस्या के कारण काश्तकारों की मेहनत पर सीधा असर पड़ रहा है और आय दोगुनी करने के प्रशासनिक दावे धरातल पर दम तोड़ रहे हैं। एक संस्था की ताजा शोध रिपोर्ट ने बागवानी उत्पादन में सामने आ रही इस खामी पर विस्तृत चेतावनी जारी की है। यदि कटाई के बाद समुचित फसल प्रबंधन प्रणाली लागू हो जाए, तो महाराष्ट्र जैसे अग्रणी राज्यों की तुलना में स्थानीय आमदनी का अंतर समाप्त हो सकता है।
संरक्षण व्यवस्था के अभाव में नष्ट होती पैदावार
वैज्ञानिक रख-रखाव और नियंत्रित तापमान वाली आधुनिक शीत गृह व्यवस्था उपलब्ध होने से हरी सब्जियों तथा रसीले फलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। उन्नत तकनीकी ढांचा मिलने पर खेत से निकले माल की ग्रेडिंग करना आसान होता है और व्यावसायिक फूड पैकेजिंग के जरिए उत्पादों की गुणवत्ता लंबे समय तक स्थिर रखी जा सकती है। वर्तमान में व्यवस्थित अधोसंरचना न होने के कारण ग्रामीण उत्पादकों को अपनी ताजी उपज औने-पौने दामों में बेचने या फेंकने की विवशता झेलनी पड़ती है। इस ढांचागत कमी को दूर किए बिना खेती को मुनाफे का सौदा बनाना अत्यंत कठिन बना हुआ है।
आधुनिक प्रबंधन प्रणाली विकसित करना बेहद जरूरी
रिपोर्ट के अनुसार कटाई उपरांत देखरेख की कमजोरी से अकेले अमरूद की 18 प्रतिशत उपज सीधे तौर पर नष्ट हो रही है। जिले में मटर का कुल उत्पादन भी अनुकूल वातावरण और फ्रीजर सुरक्षा न मिलने से 7 प्रतिशत तक खराब होता है। इसी क्रम में नियमित खपत वाली प्रमुख हरी सब्जियों फूलगोभी, बंदगोभी, लौकी और रसीले नीबू का 7 से 8 प्रतिशत हिस्सा मंडियों की दूरी तय करने से पहले सड़ जाता है। इस सालाना क्षति से धरती पुत्रों की जेबें खाली रह जाती हैं।
