जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर में प्रशासनिक विवाद गहरा गया है। पूर्व सहायक कुलसचिव अभय कांत मिश्र ने कुलगुरु प्रोफेसर राजेश वर्मा पर सेवानिवृत्ति पर मिलने वाले देयकों को अटकाने का गंभीर आरोप लगाया है। 31 मार्च 2026 को सेवानिवृत्त हुए मिश्र को ग्रेच्युटी, अवकाश नकदीकरण और पेंशन का भुगतान अब तक नहीं मिला है। पीड़ित पूर्व अधिकारी ने विश्वविद्यालय रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर 15 दिन का स्पष्ट अल्टीमेटम दिया है। उन्होंने पत्र में चेताया कि पत्नी की बीमारी और बेटी के विवाह के बीच यदि परिवार के साथ कोई अनहोनी हुई, तो इसके सीधे जिम्मेदार कुलगुरु होंगे। लगातार 5 बार आवेदन करने के बाद भी सुनवाई न होने पर उन्होंने प्रधानमंत्री, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव और राज्यपाल के उप-सचिव को पत्र भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। विश्वविद्यालय में अधिकारियों और कुलगुरु के बीच बढ़ते टकराव से प्रशासनिक व्यवस्था पर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
5 बार लगाई गुहार नहीं मिला कोई समाधान
विश्वविद्यालय परिसर में प्रशासनिक स्तर पर चल रही खींचतान ने अब मानवीय संवेदनशीलता को भी कटघरे में खड़ा कर दिया है। सेवा से मुक्त होने के बाद कर्मचारी अपने जीवनभर की जमा पूंजी और वैधानिक अधिकारों के लिए भटक रहे हैं। जबलपुर स्थित उच्च शिक्षण संस्थान से विदा लेने के उपरांत मूल रूप से ग्वालियर निवासी पूर्व अधिकारी के लिए लंबी दूरी तय करके बार-बार चक्कर काटना शारीरिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से असहनीय बन चुका है। विभागीय फाइलों को स्वीकृत करने के बजाय उन्हें दबाकर रखने की कार्यशैली पर सवाल उठ रहे हैं। बार-बार लिखित मांग पत्र सौंपने के बावजूद संबंधित पटल से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई। प्रशासनिक उपेक्षा के चलते सेवानिवृत्त कर्मियों का भरोसा पूरी व्यवस्था से उठने लगा है। दफ्तरों के अनगिनत चक्कर लगाने के बाद भी जब वैधानिक देयकों का निपटारा नहीं हुआ, तो यह मामला सीधे टकराव की स्थिति में बदल गया।
इलाज और बेटी की शादी में गहराया संकट
पारिवारिक जिम्मेदारियों के समय सेवानिवृत्ति लाभ न मिलने से पूरा परिवार भारी आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहा है। घर में मांगलिक कार्य की तैयारियां अधर में लटकी हैं और दूसरी ओर जीवनसाथी के निरंतर गिरते स्वास्थ्य ने चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है। ग्वालियर के चिकित्सालयों में चल रहे उपचार के लिए नियमित पैसों की दरकार है। आर्थिक संकट के इस कठिन दौर में वैधानिक धन का न मिलना किसी मानसिक प्रताड़ना से कम नहीं साबित हो रहा है। पीड़ित पक्ष ने दो टूक शब्दों में प्रशासन को चेताया है कि तय समय सीमा के भीतर समस्त रुका हुआ भुगतान जारी किया जाए। जीवन के इस नाजुक मोड़ पर अधिकारियों की बेरुखी से उत्पन्न मानसिक तनाव ने पूरे परिवार को गहरी निराशा में धकेल दिया है।
शासन से लेकर राजभवन तक न्याय की उम्मीद
स्थानीय स्तर पर समाधान के सारे रास्ते बंद होते देख इस मामले की गूंज अब देश और राज्य की शीर्ष सत्ता तक पहुंचाई गई है। कार्यप्रणाली में सुधार और त्वरित कार्रवाई की उम्मीद में भेजे गए पत्राचार ने उच्च शिक्षा तंत्र की जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं। इससे पूर्व भी इस परिसर में कुलसचिव और अन्य उच्च पदस्थ सहायकों के साथ शीर्ष नेतृत्व की खींचतान की घटनाएं सामने आती रही हैं। प्रशासनिक समन्वय के अभाव में संस्थान का माहौल लगातार प्रभावित हो रहा है। अब देखना यह होगा कि शीर्ष स्तर पर हुई इस शिकायत के बाद शासन तंत्र क्या ठोस कदम उठाता है और पीड़ित परिवार को राहत कब तक मिल पाती है।
