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प्राध्यापकों का मौन संकल्प: बांधी काली पट्टी, मांगा हक



जबलपुर। जबलपुर संभाग के 100 से अधिक कॉलेजों में आज प्राध्यापकों ने अपनी न्यायोचित मांगों के लिए एक अनूठा और कलात्मक विरोध दर्ज कराया। अपनी भुजाओं पर काली पट्टी बांधकर, उन्होंने शांत रहकर भी अपनी पीड़ा की गूंज शासन के गलियारों तक पहुंचाई। प्रमोशन, परिवीक्षा अवधि और वेतनमान जैसी समस्याओं को लेकर उपजे इस आक्रोश को संघ के पदाधिकारियों ने एक अनुशासित मंच दिया है। इस आंदोलन के प्रथम चरण में संभागीय अध्यक्ष प्रो.अरुण शुक्ल, जिला अध्यक्ष डॉ शैलेंद्र श्रीवास्तव, डॉ ए सी तिवारी, डॉ शिखा सक्सेना, डॉ विभा निगम, डॉ ज्योति जुनगारे, डॉ अभय सिंह उइके, डॉ देवेंद्र कोष्टा, डॉ रवीश तमन्ना ताजिर, डॉ जागेश्वर प्रजापति, डॉ मोना मरकाम, डॉ जया बाजपेई, डॉ मनीष शर्मा, डॉ अलगले, डॉ अमिता सिंह, डॉ बुशरा खान, डॉ महेंद्र कुशवाहा, डॉ साक्षी मरावी, डॉ उमा भारती और डॉ रूपाली उपाध्याय की उपस्थिति में प्राध्यापकों ने एक जुटता की शक्ति दिखाई।

​काली पट्टी का मौन विरोध सरकार को जगाएगा

​प्राध्यापकों का यह विरोध प्रदर्शन केवल एक कार्य प्रक्रिया नहीं, बल्कि उपेक्षा के विरुद्ध एक आत्मसम्मान की लड़ाई है। विज्ञान महाविद्यालय, महाकोशल महाविद्यालय, मन्कुवार, होम साइंस और पनागर, बरेला, सिहोरा, बरगी, गढा, चारगांवा व कुंडम के कॉलेजों में एक साथ उठी यह मांग सरकार के लिए चेतावनी है। 4 साल से सेवानिवृत्त प्राध्यापकों को उनके अर्जित अवकाश का भुगतान न मिलना प्रशासनिक संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है। अब समय आ गया है कि शासन इस मौन को समझे। यद्यपि अपर सचिव द्वारा प्रांतीय नेतृत्व को चर्चा के लिए आमंत्रित किया गया है, लेकिन जब तक लिखित और ठोस आश्वासन नहीं मिलता, तब तक यह काली पट्टी का प्रतीक चिन्ह हमारी दृढ़ता को परिभाषित करता रहेगा। यह संघर्ष न्याय की अग्नि है जो अपने लक्ष्य प्राप्ति तक शांत नहीं होगी।

​अधिकारों की प्राप्ति तक जारी रहेगा यह संग्राम

​प्रो. अरुण शुक्ला ने कहा कि संघ के नेतृत्व ने स्पष्ट किया है कि यह आंदोलन का प्रथम चरण है। यदि आने वाले 15 दिन में समस्याओं का समाधान नहीं होता है, तो आगे के चरणों की घोषणा शीघ्र की जाएगी। आंदोलन की यह एकजुटता दर्शाती है कि प्राध्यापक अब अपनी उपेक्षा सहन करने को तैयार नहीं हैं। प्रांतीय प्राध्यापक संघ के तत्वावधान में शुरू हुआ यह श्री गणेश सरकार के लिए एक आईना है। अब गेंद पूरी तरह से शासन के पाले में है कि वह कब इन बुद्धिजीवियों की मांगों को गंभीरता से लेते हुए उनके भविष्य को सुरक्षित करता है। शिक्षक समाज की यह चेतना केवल वेतन या पदोन्नति की मांग नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था में सुधार लाने की एक संकल्पित यात्रा है।

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