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आरडीयू में कर्मचारियों के नियमितीकरण आदेश पर लगी अस्थायी रोक



जबलपुर। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में 13 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को नियमित करने का मामला इन दिनों काफी गरमाया हुआ है,जिसके चलते प्रशासनिक हलकों में हलचल मची है। विश्वविद्यालय के कुलसचिव कार्यालय ने 21 जून को इन सभी कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश जारी किया था और इसके बाद इनकी सर्विस बुक अपडेट करने की प्रक्रिया भी तेजी से शुरू कर दी गई थी ताकि इन्हें नया वेतनमान मिल सके। लेकिन इस बीच विश्वविद्यालय के कुलकुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा ने इस पूरी प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाते हुए 14 जुलाई को एक नया आदेश जारी कर दिया। कुलगुरु ने 21 जून को जारी हुए नियमितीकरण के आदेश पर तत्काल प्रभाव से अस्थायी रोक लगा दी है। उनका कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में कुछ विसंगतियां पाई गई हैं जिनकी जांच जरूरी है। कार्यपरिषद की बैठक में जब इस रोक को हटाने पर चर्चा हुई तो उसने ऐसा करने से साफ इनकार कर दिया जिसके बाद कुलगुरु ने अपनी प्रतिष्ठा और नियमों का हवाला देते हुए खुद यह बड़ा कदम उठाया। विश्वविद्यालय प्रशासन किसी भी कानूनी दांवपेंच से बचने के लिए पूरी तरह सतर्क हो गया है और कर्मचारियों के न्यायालय जाने की संभावना को देखते हुए परीक्षा नियंत्रक के माध्यम से मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में पहले ही एक केविएट दाखिल कर दी गई है ताकि बिना पक्ष सुने कोई एकतरफा आदेश पारित न हो सके। इस पूरे घटनाक्रम के सामने आने के बाद कर्मचारियों का एक असंतुष्ट गुट खुलकर विरोध में आ गया है और कुलकुलगुरु कार्यालय को निशाने पर ले रहा है।

​कौन से आदेश पर लगाई गई है रोक

​विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. रविशंकर सोनवाल ने शासन के निर्देशों और समिति की अनुशंसा के आधार पर 21 जून को 13 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश जारी किया था। इस आदेश के तहत सभी पात्र कर्मचारियों की फाइलें आगे बढ़ाई गईं और उनके सेवा अभिलेखों को दुरुस्त करने का काम भी शुरू कर दिया गया ताकि उन्हें नियमित कर्मचारियों की तरह सभी वित्तीय लाभ और बढ़ा हुआ वेतन मिल सके। लेकिन जैसे ही यह प्रक्रिया आगे बढ़ी, विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. राजेश वर्मा को इसमें कुछ नियमों के विपरीत होने की आशंका हुई। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए 14 जुलाई को एक आधिकारिक आदेश जारी किया और 21 जून के उस आदेश पर तत्काल प्रभाव से अस्थायी रोक लगा दी। कुलकुलगुरु के इस अचानक उठाए गए कदम से प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है क्योंकि इससे पहले कार्यपरिषद ने इस रोक के प्रस्ताव को खारिज कर दिया था। अब इस फैसले के बाद विश्वविद्यालय के भीतर ही दो पक्ष आमने-सामने आ गए हैं और प्रशासनिक कामकाज पर भी इसका असर साफ दिखाई दे रहा है।

हाईकोर्ट में केविएट दाखिल कर बढ़ाई गईं मुश्किलें 

​विश्वविद्यालय प्रशासन को इस बात का पूरा अंदेशा था कि नियमितीकरण पर रोक लगने के बाद प्रभावित कर्मचारी अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं। इसी कानूनी चुनौती से निपटने के लिए विश्वविद्यालय ने बेहद एहतियाती कदम उठाते हुए परीक्षा नियंत्रक के जरिए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक मजबूत केविएट दाखिल कर दी है। इसका सीधा मतलब यह है कि यदि कर्मचारी इस रोक के खिलाफ अदालत में कोई याचिका दायर करते हैं तो अदालत बिना विश्वविद्यालय का पक्ष सुने कोई भी आदेश पारित नहीं करेगी। जानकारों का मानना है कि यह कानूनी दांव विश्वविद्यालय प्रशासन ने अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए खेला है ताकि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की असुविधा से बचा जा सके। दूसरी ओर कर्मचारियों का एक गुट इस फैसले से बेहद खफा है और वे लगातार विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर कर रहे हैं। इस कानूनी और प्रशासनिक खींचतान के कारण विश्वविद्यालय का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है और हर कोई आने वाले दिनों में अदालत के रुख का इंतजार कर रहा है।

समिति की रिपोर्ट और विसंगतियों पर टिकी नजरें

​वर्ष 2016 में मध्य प्रदेश शासन ने पारंपरिक विश्वविद्यालयों में दस साल से सेवा दे रहे दैनिक वेतन भोगियों को नियमित करने के निर्देश दिए थे। इसी नीति के तहत रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में एक विशेष समिति का गठन किया गया था जिसने अपनी जांच के बाद पात्र कर्मचारियों की सूची तैयार की थी। समिति की इसी अनुशंसा को कार्यपरिषद के सामने रखा गया था जिसकी हरी झंडी मिलने के बाद कुलसचिव ने नियमितीकरण के आदेश जारी किए थे। अब कुलकुलगुरु का यह कहना है कि यदि प्रक्रिया में कोई भी विसंगति पाई जाती है तो जांच के दायरे में वे तमाम लोग भी आ सकते हैं जिन्होंने समिति में रहकर इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाया था। इस पूरे विवाद ने विश्वविद्यालय के आंतरिक कामकाज और निर्णयों पर कई तरह के सवाल खड़े कर दिए हैं। कर्मचारियों का भविष्य इस समय अधर में लटका हुआ है क्योंकि प्रशासनिक फेरबदल और रोक के कारण उनकी मुश्किलें लगातार बढ़ती जा रही हैं। आने वाले समय में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इस कानूनी और प्रशासनिक उलझन को किस प्रकार सुलझाता है और क्या कर्मचारियों को उनका हक मिल पाता है या नहीं।

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