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संजय पाठक केस: 45 मिनिट तक चली जिरह, फैसला रिजर्व



जबलपुर। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में कटनी जिले के विधायक संजय पाठक से जुड़े आपराधिक अवमानना मामले की सुनवाई अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। एक्टिंग चीफ जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की बेंच के समक्ष संजय पाठक तीसरी बार व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। सुनवाई के दौरान 45 मिनिट तक पक्ष-विपक्ष के वकीलों ने अपनी दलीलें रखीं। यह पूरा प्रकरण 30 अगस्त 2025 को जस्टिस विशाल मिश्रा को किए गए फोन कॉल से संबंधित है। उस समय जस्टिस मिश्रा ने इस घटना के बाद विधायक के परिवार से जुड़ी खदानों के केस से खुद को अलग कर लिया था। अब सभी की निगाहें हाईकोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं जो किसी भी समय आ सकता है।

अदालत के तीखे सवाल और बचाव का प्रयास

​विधायक संजय पाठक की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट को बताया कि कॉल एक गलती थी और उसे तुरंत काट दिया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि विधायक ने बाद में जस्टिस मिश्रा को संदेश भी भेजा था। जब बचाव पक्ष ने कहा कि नंबर सेव नहीं था, तो बेंच ने तुरंत टोकते हुए पूछा कि बिना नंबर सेव किए कॉल कैसे लग गया। कोर्ट के इस कड़े सवाल का जवाब देते हुए वकीलों ने इसे तकनीकी संयोग बताया और विधायक की तरफ से बिना शर्त माफी मांगी। इस दौरान अनिल खरे, संपूर्ण तिवारी और शमिला इरम फातिमा ने भी बचाव पक्ष की ओर से दलीलें पेश कीं।

शिकायतकर्ता ने रखी कॉल रिकॉर्ड जांच की मांग

​सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता आशुतोष मनु दीक्षित के वकील देवदत्त कामत ने कड़ा रुख अपनाते हुए निष्पक्ष जांच की मांग दोहराई। उन्होंने कोर्ट में तर्क दिया कि यदि कॉल केवल गलती से लगा था, तो इसकी सच्चाई जानने का सबसे बेहतर तरीका कॉल डिटेल्स मंगवाना है। देवदत्त कामत ने स्पष्ट कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में किसी भी तरह का हस्तक्षेप अवमानना की श्रेणी में आता है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने जस्टिस मिश्रा के उस आदेश का हवाला दिया जिसमें उन्होंने फोन के जरिए संपर्क किए जाने की बात लिखी थी। दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने फैसला सुरक्षित रखने का आदेश दिया।

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