जबलपुर। हिंदू धर्म में चतुर्मास का विशेष महत्व है जो इस वर्ष 25 जुलाई से शुरू होकर 20 नवंबर को देवप्रबोधिनी एकादशी तक चलेगा। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से आरंभ होने वाली इस 4 महीने की अवधि में विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे सभी मांगलिक कार्यों पर पूरी तरह रोक रहेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय भगवान विष्णु क्षीर सागर में शेषनाग की शय्या पर योग निद्रा में चले जाते हैं। सृष्टि के संचालन की जिम्मेदारी महादेव संभालते हैं। यह काल केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य रक्षा के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। इस दौरान सात्विक जीवन शैली का पालन करना अनिवार्य होता है ताकि मनुष्य अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण रख सके और स्वस्थ रहे।
वर्षा ऋतु में सेहत के लिए खानपान नियम
चतुर्मास का समय पूरी तरह मानसून के दौरान रहता है। वैज्ञानिक और आयुर्वेद के नजरिए से इस मौसम में वातावरण में नमी बढ़ने के कारण बैक्टीरिया सक्रिय हो जाते हैं। इससे मनुष्य की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है और संक्रमण व बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इन कारणों से ऋषियों ने इस दौरान सात्विक भोजन और उपवास का विधान बनाया है ताकि शरीर स्वस्थ और संतुलित रहे। इस समय तामसिक भोजन जैसे मांस, मदिरा, प्याज और लहसुन से पूरी तरह दूरी बनानी चाहिए। साथ ही महीने के अनुसार भी नियमों का पालन करना होता है जैसे सावन में हरी पत्तेदार सब्जी से परहेज, भाद्रपद में दही का त्याग, अश्विन मास में दूध का सेवन कम करना और कार्तिक मास में कुछ विशेष दाल का सेवन नहीं करना चाहिए।
भक्ति और सेवा से पुण्य प्राप्ति का अवसर
धार्मिक मान्यता है कि चतुर्मास में किए जाने वाले जप, तप और दान का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक प्राप्त होता है। इस दौरान नियमित रूप से विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करना अत्यंत शुभ और समृद्धि दायक माना गया है। सुबह और शाम तुलसी के पौधे में घी का दीपक जलाना लाभदायक होता है। जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और धन का दान करने से पुण्य की प्राप्ति होती है। इस अवधि में त्यौहारों का विशेष महत्व है जिसमें सावन में शिव भक्ति, भाद्रपद में श्रीकृष्ण और गणेश पूजन व अश्विन में मां दुर्गा की आराधना का विधान है। इन 4 महीनों में भूमि पर शयन करना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, सत्य बोलना और यथासंभव मौन रहने का विशेष महत्व बताया गया है।
