याचिका में बताया गया कि प्रदेश में बड़ी संख्या में ई-रिक्शा बिना परमिट के संचालित हो रहे हैं। लगातार बढ़ती संख्या के कारण शहरों में ट्रैफिक जाम, अव्यवस्था और दुर्घटनाओं की समस्या बढ़ रही है। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि अकेले जबलपुर शहर में ही 9 हजार से अधिक ई-रिक्शा चल रहे हैं। सड़कों पर इनकी संख्या बढऩे से यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है। आरोप लगाया गया कि कई जगह नाबालिग और बिना लाइसेंस वाले चालक भी ई-रिक्शा चला रहे हैं, जिससे हादसों का खतरा बढ़ गया है। याचिका में कहा गया कि भारत सरकार के 2018 के नोटिफिकेशन के तहत ई-रिक्शा और बैटरी चलित वाहनों को मोटर व्हीकल एक्ट की धारा 66 के तहत परमिट की अनिवार्यता से छूट दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इसी छूट का दुरुपयोग हो रहा है और बड़ी संख्या में बिना नियमों के वाहन सड़कों पर दौड़ रहे हैं। अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी निर्देश लेने को कहा है कि ई-रिक्शा और बैटरी चलित वाहनों को दी गई छूट को वापस लेने पर क्यों विचार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने मामले को गंभीर मानते हुए सरकार से स्पष्ट जवाब मांगा है।
केंद्र सरकार छूट पर दोबारा विचार करे-
याचिकाकर्ताओं के अधिवक्ता दिनेश उपाध्याय ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि ई-रिक्शा को दी गई छूट के कारण शहरों में वाहनों की बाढ़ आ गई है। हर सड़क पर ई-रिक्शा दिखाई दे रहे हैं और यातायात व्यवस्था प्रभावित हो रही है। उन्होंने मांग की कि केंद्र सरकार इस छूट पर दोबारा विचार करे और आवश्यक संशोधन किए जाएं। आज सुनवाई के दौरान भारत सरकार की ओर से असिस्टेंट सॉलिसिटर जनरल उपस्थित हुए और जवाब पेश करने के लिए समय मांगा। इस पर हाईकोर्ट ने 4 सप्ताह की मोहलत दी है।
