जबलपुर। मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी ने जबलपुर में बिजली उत्पादन इकाइयों के वार्षिक और पूंजीगत रखरखाव के बाद उनके अधिक सुरक्षित, कुशल और निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष तकनीकी निगरानी मॉडल लागू करने का बड़ा निर्णय लिया है। प्रबंध संचालक मनजीत सिंह ने इस नवाचार की घोषणा करते हुए बताया कि मशीनों की कार्य प्रणालियों का समय पर मूल्यांकन बेहद आवश्यक है। इसके तहत मुख्यालय और विद्युत गृहों के अनुभवी और युवा विशेषज्ञ अभियंताओं की संयुक्त समन्वय टीम बनाई गई है, जो निष्पक्ष और व्यापक तकनीकी मूल्यांकन के जरिए बिजली उत्पादन की विश्वसनीयता को बढ़ाएगी। यह कंपनी वर्तमान में अपने 4 ताप विद्युत गृहों, 10 जल विद्युत गृहों और 1 सोलर प्रोजेक्ट के माध्यम से कुल 5492 मेगावाट बिजली का उत्पादन कर रही है।
संयुक्त समन्वय टीम करेगी सुरक्षा और दक्षता की स्वतंत्र जांच
इस नई व्यवस्था के तहत गठित की गई यूनिटवार समन्वय टीमें ओवरहॉल कार्यों की योजना, निरीक्षण, मूल्यांकन और अनुपालन की लगातार निगरानी करेंगी। इस तकनीकी मॉडल की मुख्य विशेषता यह है कि किसी भी समूह में शामिल अभियंता अपनी खुद की विद्युत उत्पादन इकाई के रखरखाव कार्यों से जुड़े नहीं होंगे। इससे पूरी निरीक्षण प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष रहेगी और व्यापक तकनीकी सुझाव मिल सकेंगे। यह स्वतंत्र व्यवस्था संभावित तकनीकी कमियों या संचालन में आने वाली बाधाओं को पूरी तरह खत्म करने का काम करेगी, जिससे बिजली घरों में कामकाज का स्तर सुधरेगा।
नियमित तकनीकी जांच से दूर होंगी बिजली घरों की पुरानी ट्रिपिंग प्रॉब्लम
समन्वय टीम रखरखाव की अवधि में विभिन्न बिजली घरों का लगातार दौरा करेगी। यह टीम इस बात की बारीकी से जांच करेगी कि पिछली रखरखाव अवधि के बाद आई तकनीकी ट्रिपिंग के मूल कारणों का सही विश्लेषण करके सुधारात्मक कदम उठाए गए हैं या नहीं। इसके साथ ही तकनीकी कार्यों की गुणवत्ता की समीक्षा की जाएगी। सभी गतिविधियों का एक दैनिक प्रगति प्रतिवेदन तैयार किया जाएगा, जिसका सत्यापन संबंधित विद्युत गृह में काम कर रहा गुणवत्ता नियंत्रण दल करेगा, ताकि किसी स्तर पर चूक न हो।
वार्षिक और पूंजीगत रखरखाव प्रक्रिया से बढ़ेगी बिजली उत्पादन संयंत्रों की आयु
बिजली इकाइयों की कार्यक्षमता बनाए रखने और बड़ी खराबी रोकने के लिए वार्षिक ओवरहॉल प्रत्येक 1 से 2 वर्षों में होता है, जिसमें पुर्जे बदले जाते हैं। वहीं पूंजीगत ओवरहॉल 4 से 6 वर्षों में होने वाली गहरी तकनीकी प्रक्रिया है, जिसमें मुख्य मशीनों को खोलकर व्यापक सुधार किए जाते हैं। वर्तमान में चचाई, सारनी, बिरसिंगपुर और दोंगलिया के 4 ताप विद्युत गृहों से 4570 मेगावाट बिजली बनती है। गांधीसागर, तोतलाडोह, बरगी, टोंस, सिलपरा, देवलोंद, झिन्ना, बिरसिंगपुर, राजघाट और मड़ीखेड़ा के 10 जल विद्युत गृहों से 915 मेगावाट तथा रतागुरडिया सोलर प्रोजेक्ट से 7 मेगावाट मिलाकर कुल 5492 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता सुरक्षित होगी।
